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Madhyakaleen Kavita Ka Path

by Ed. by Prof. Dr. Tribhuvan Nath Shukla
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789362874924
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 152
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 20th Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

मध्यकालीन कवियों को लेकर इधर कई सवाल खड़े किये जा रहे हैं। कुछ एक आधुनिकतावादियों का तो यहाँ तक कहना है कि मध्यकाल अब अप्रासंगिक हो चुका है। ऐसी स्थिति में पाठ्यक्रमों में मध्यकालीन काव्य की स्थिति संदिग्ध करार कर दी जाती है। मगर वस्तुस्थिति इससे एकदम भिन्न है। वैश्विक क्षितिज पर जब हिन्दी कविता के पहचान की बात की जाती है तो मध्यकालीन कविता ही है जो वैश्विक काव्य-चेतना में अपनी पृथक अस्मिता बनाये हुए है। आधुनिक हिन्दी कविता तो वह 'अपनी पहचान' करा पाने में कदापि सक्षम नहीं है। मध्यकालीन कविता का बहुलांश आज भी अपनी खास पहचान बनाये हुए हैं। कारण कि कृतिकार की सामाजिक चेतना कभी बसियाती नहीं।इस रूप में मध्यकाल आज भी हमें चेतना प्रदान करने में सक्षम है। इस संदर्भ में यह कहना अत्युक्ति न होगी कि आज हम चाहे जितने प्रगतिवादी क्यों न बन लें, कितने ही वैज्ञानिक अथवा अत्याधुनिक युग का मानव अपने को क्यों न (आत्मतुष्टि हेतु) कह लें, फिर भी हम मध्ययुग में ही जी रहे हैं। हमारे संस्कार और आदर्श मध्ययुगीन ही हैं। फिर ये मध्ययुगीन आदर्श और संस्कार भले ही पूर्व युग के क्यों न हों, भी हमें दिशाबोध और युगबोध कराने में पूर्ण सक्षम हैं। अस्तु, इन्हें विस्मृत कर देने पर हमें अपनी पहचान करा पाने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। हमारे अस्तित्व और अस्मिता पर संदिग्धता की मुहर लग सकती है। ऐसी स्थिति में हमें मध्ययुगीन साहित्य के अन्तर्गत प्राप्त जीवन मूल्यों को बड़ी सजगता के साथ सहजता होगा। हमारे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि हम मध्ययुग के उन जीवन-मूल्यों को भी अपना लें, जो आज अपना मूल्य खो चुके हैं, अपितु उनसे है जो आज भी हमें दीपित करने की ऊष्मा रखते हैं।प्रस्तुत संग्रह प्रामाणिक पाठों के आधार पर तैयार किया गया है। 'मध्यकालीन कविता का पाठ' यदि अध्यताओं के लिये उपयोगी सिद्ध हो सका तो मैं अपना श्रम सार्थक समझंगा ।मेरे प्रत्येक सारस्वत कार्य में सरस्वती की धारा की भाँति जिनकी अनिर्दिष्ट सत्परामर्श संनिहित रहता है ऐसे सामान्य गुरुवर डॉ० महाबीर सरन जैन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मेरे शब्द अट नहीं पाते ।इसकी प्रेस कापी तैयार करने में मेरे विभागीय सहयोगी एवं मित्र डॉ० सत्यनारायण प्रसाद ने जो सहयोग प्रदान किया है उसके लिए मैं उनका हृदय से आभारी हूँ ।— त्रिभुवन नाथ शुक्ल

प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्लजन्म : 13 जुलाई 1953 ई., मधू का पूरा, करछना, प्रयागराज (उ.प्र.) ।माता-पिता : श्रीमती सुखराजी शुक्ला एवं पं. रामचन्द्र शुक्ल ।प्रकाशित कृतियाँ : रामचरित मानस के शब्दों का अर्थतात्त्विक अध्ययन (पुरस्कृत), अवधी का स्वनमिक अध्ययन, मध्यकालीन कविता का पाठ, कोश निर्माण: प्रविधि एवं प्रयोग, भाषीय औदात्य, विद्यापति, अनुबन्ध, रंग-सप्तक, अवधी साहित्य की भूमिका, अवधी साहित्य के आधार स्तम्भ, अवधी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (पुरस्कृत), हिन्दी भाषा का आधुनिकीकरण एवं मानकीकरण, अवधी लोक साहित्य कला एवं संस्कृति, वेली रुक्मणीरी क्रिशन, समीक्षक आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी, साहित्य के सौ वर्ष, भारतीय बाल साहित्य की भूमिका, भारतीय बाल साहित्य का इतिहास, कालिदास पर्यायकोश (दो खण्ड), हिन्दी-अंग्रेज़ी कोश, कामायनी शब्दानुक्रम कोश, रामचरितमानस शब्दानुक्रम कोश, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय विचार कोश, हिन्दी क्रिया कोश, वृहत अभिनव हिन्दी शब्दकोश (दो खंड), भोपाल सन्देश, साहित्य के शाश्वत प्रतिमान, साहित्य कला एवं संस्कृति आदि कुल 40 ग्रन्थ ।अन्तरराष्ट्रीय सम्मान : फ्लोरिडा विश्वविद्यालय, मियामी, अमेरिका द्वारा 'विश्व तुलसी सम्मान' ।प्रमुख राष्ट्रीय सम्मान : 'सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान' (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा, मानव संसाधन मन्त्रालय भारत), 'साहित्य भूषण सम्मान' (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ), ‘टैगोर सम्मान', भोपाल एवं अन्य अनेक सम्मानों से पुरस्कृत ।सम्प्रति : राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद् न्यास, नयी दिल्ली। निदेशक, (मानद्) रामचरितमानस अन्तरराष्ट्रीय अनुसन्धान केन्द्र, प्रमोदवन, चित्रकूट (उ.प्र.) ।

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