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Mela

by Kishor Kumar Sinha
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170550723
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 144
  • Original Price: INR 100.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

मेला - भारतवर्ष मेलों का देश है। हर गाँव में, क़स्बे में, शहर में, हर साल कोई-न-कोई जुलूस, तमाशा होता है। इनमें से हर एक किसी-न-किसी घटना, त्यौहार या पर्व से जुड़ा होता है। मेले लगते भी ख़ास जगहों पर हैं। किसी मन्दिर के सामने, बाबा की कुटिया के पास, पीर के मज़ार के चारों ओर या फिर किसी तालाब या नदी के किनारे लेकिन गंगा के किनारे लगने वाले मेलों की बात ही और है। हज़ारों-लाखों गाँववासी बरबस खिंचे चले आते हैं इस नदी के तट पर। क्यों भला? क्या मिलता है गंगा तट पर? ऐसा क्या है गंगा में कि जिसकी वजह से ठण्ड से ठिठुरती औरतें, बच्चे, बूढ़े सभी डुबकी लगाकर नहाते हैं। शायद गंगा में पाप धोने की शक्ति है और पुण्य देने की भी। लेकिन इसे प्रदूषित करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। आख़िर कहाँ तक पाप धोयेगी गंगा! इसी प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश की गयी है इस उपन्यास में।अन्तिम पृष्ठ आवरण - मुशायरा शुरू होने के साथ-ही-साथ मेले में विचरण कर रहे कला और संगीत के प्रेमी भी पण्डाल की ओर चल दिये। रात्रिकाल कार्यक्रमों में रूचि रखनेवाले अन्य लोग नौटंकी, सरकस और डांस-ड्रामा देखने के लिए मेले में मनोरंजन-क्षेत्र में चले गये। गंगा नहाने वाले ग्रामीणों को चूँकि दूसरे दिन सुबह पाँच बजे ही उठना था इसलिए उनमें से भी ज़्यादातर जहाँ जगह मिली, वहाँ सोने की कोशिश करने लगे। ड्यूटी पर तैनात पुलिस और होमगार्ड के जवान भी दिन भर की मशक्कत से थक गये थे और सुस्ता रहे थे। फायर ब्रिगेड के जवान सन्तुष्ट थे कि हमेशा की तरह उनकी सेवाओं की आवश्यकता आज भी नहीं पड़ेगी। निश्चित थे और किसी भी मुसीबत से निपटने के लिए आत्मविश्वास से भरे हुए अपनी जगहों पर ऊँघ रहे थे।

किशोर कुमार सिन्हा - किशोर कुमार सिन्हा सन् 1955 में अलीगढ़ शहर में पैदा हुए वहीं के स्कूल कॉलेजों में शिक्षा हुई। अलीगढ़ से ही हिन्दी पत्रिकाएँ, पुस्तकें पढ़ने का सिलसिला शुरू हो गया। घर में पढ़ने-पढ़ाने का वातावरण था।वर्ष 1971 में दिल्ली विश्वविद्यालय में भौतिकी में अध्ययन प्रारम्भ किया व 1976 में सेंट स्टीफेंस कॉलेज से एम.एससी. में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसी बीच हिन्दी लेखन, भौतिकी विभाग में हिन्दी संस्था का गठन भी हुआ।1977 में भारतीय राजस्व सेवा व 1978 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हुए। हिन्दी नाटक मंचन करने के अवसर प्राप्त हुए, और 1980 में सहारनपुर में नाट्य संस्था की स्थापना हुई। वर्ष 1985 में फ़र्रुखाबाद के ज़िला कलक्टर के कार्यालय में दृष्टिकोण नामक हिन्दी संस्था की स्थापना की और विधिवत लेखन कार्य शुरू किया।बँधुआ मज़दूरों पर आधारित प्रथम उपन्यास 'गाथा भोगनपुरी' 1986 में प्रकाशित हुआ। आगरा शहर की व्यथा लिए, दूसरा उपन्यास 'बेताज शहर' वर्ष 1988 में प्रकाशित हुआ। तीसरा उपन्यास, 'मेला' वर्ष 1990 में पाठकों के समक्ष आया।पहला नाटक संग्रह, 'क़िस्सा पंचायत राज का' वर्ष 1996 में छपा और नवीनतम नाटक संग्रह 'झाँसी का क़िला' वर्ष 1999 में प्रकाशित किया गया है।1977 से 2001 के सेवाकाल में विकास आयुक्त आगरा, कलक्टर फ़र्रुखाबाद, कलक्टर इटावा, प्रबन्ध निदेशक, उ.प्र. खाद्य निगम, वरिष्ठ प्रबन्धक भारतीय खाद्य निगम, सचिव शिक्षा, सचिव पर्यावरण, आयुक्त बरेली मण्डल, सचिव वित्त विभाग आदि पदों पर कार्यरत रहे। अब सचिव चिकित्सा विभाग के पद पर कार्यरत हैं।वर्ष 1995 में ग्रेट ब्रिटेन से ग्राम्य विकास में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की और 1998 में मास्टर ऑफ़ बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री प्राप्त की है। हिन्दी भाषा में मुहावरों के माध्यम से हास्य व्यंग्य पर पुस्तक का लेखन चल रहा है।भारतीय पक्षियों के बारे में एक डाइरेक्टरी 'ए बर्ड टोल्ड अस' प्रकाशनाधीन है। यह पुस्तक पत्नी कविता सिन्हा के साथ लिखी गयी है। पुस्तक के ग्राफ़िक्स पुत्र समर्था के हैं तथा पक्षियों की आकृतियाँ पुत्री कनिका द्वारा रेखांकित की गयी हैं। यही टीम अब नयी पुस्तक 'यू एंड योर पैट्स' पर भी कार्य कर रही है।

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