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Muhajirnama

by Munawwar Rana
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352291519
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 134
  • Original Price: INR 199.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

मुहाजिरनामा - बुद्ध और महावीर को घर छोड़ना नहीं पड़ा। उनके जीवन में ऐसी क्रान्ति घटी कि उनके महल अपने आप छूट गये, छोड़ने और छूट जाने में बड़ा अन्तर है जब बुद्ध और महावीर से घर छूटा तो वे दोबारा वापस अपने महलों में नहीं लौटे। उन दोनों के जीवन में आध्यात्मिक और धार्मिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ, लेकिन एक आम आदमी को हालात के चलते, या यूँ कहें कि ज़बरदस्ती घर से अलग कर दिया जाये तो भौतिक रूप से घर तो छूट जाता है लेकिन यादों में कभी नहीं छूटता, जैसे बचपन का प्यार ताउम्र याद रहता है। भले ही हम जीवन के किसी भी पड़ाव पर खड़े हो। ठीक उसी तरह जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हुआ और हालात के चलते जिन ने अपना घर-बार, आशियाना छोड़ा, उनके दिल से कभी कोई चीज़ छूट नहीं पायी और हमारा मन भी कुछ ऐसा ही है कि जब कोई चीज़ हमसे ज़बरदस्ती छूट जाती है तो हमारे मन की बात हमारे दिल के और क़रीब आ जाती है। लेकिन मुनव्वर राना ने इस अहसास को, और इस अहसास के दर्द को जिस शिद्दत से महसूस किया और अपनी शायरी में पिरोया है वो कभी ना भूलने वाला अहसास है। उनकी शायरी पढ़ने के बाद आपको अपना माजी ख़ुद-ब-ख़ुद याद आ जायेगा और आपका मन करेगा कि दिल खोल कर रोयें। 'मुहाजिरनामा' वो रचना है जिसके तअल्लुक़ से मुनव्वर राना बरसों नहीं बल्कि सदियों तक याद किये जायेंगे। बकौल मुनव्वर राना...मंज़िल क़रीब आते ही एक पाँव कट गया चौड़ी हुई सड़क, तो मेरा गाँव कट गया।-उपेन्द्र राय(एडिटर एवं न्यूज़ डायरेक्टर सहारा मीडिया)

मुनव्वर राना - मेरा जन्म 26 नवम्बर, 1952 को उत्तर प्रदेश के शहर रायबरेली में हुआ। रायबरेली जो मलिक मोहम्मद जायसी, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुल्ला दाऊद, राणा बेनी माधव, मौलाना अबुल हसन नदवी जैसी शख्सियतों की ख़ुश्बू से आज तक महकता है, सियासी तौर पर भी ये शहर फ़िरोज़ गाँधी, इंदिरा गाँधी और अब सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी से दीवानगी की हद तक मोहब्बत करता है। हमारे पूर्वज इस शहर की आलमगीरी मस्जिद में इमामत करते थे और बच्चों को उर्दू और हिन्दी पढ़ाते थे। आज भी पुराने शहर के लगभग सभी परिवारों के पूर्वज हमारे दादा और परदादा के पढ़ाये हुए हैं। बटवारे में हमारा दोहरा नुक़सान हुआ। क्योंकि हमारी तो ज़मीन भी गयी और खानदान भी चला गया। इस किताब को लिखते समय मुझे कितने दुखों से गुज़रना पड़ा होगा इसका अन्दाज़ा सिर्फ़ इस बात से लगाया जा सकता है कि मुझे डॉ. एपी मजूमदार और डॉ. कौसर उस्मान की निगरानी में कलकत्ता और लखनऊ के अस्पतालों में भर्ती होना पड़ा। इस किताब को लिखते समय 60-62 बरस से बटवारे के दहकते हुए अंगारों पर मुझे इतनी बार लोटना पड़ा है कि मेरी सोच की आत्मा पर भी उसके फफोले उभर आये। उम्र के 59 वें जीने पर खड़े होकर मैं सच्चाई के साथ ये बता देना चाहता हूँ कि ये कुछ यादों के फफोले हैं जो इस किताब के काग़ज़ पर शायरी की सूरत में उभर आये हैं। यादों की इस अधजली एलबम को आप तक पहुँचाने के लिए हम अपने छोटे भाई और बेटे जैसे श्री उपेन्द्र राय और सहारा इंडिया परिवार के आभारी हैं।

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