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Mujtaba Husain Ke Khake

by Dr. Raheel Siddiqi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350002094
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 131
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

मुज्तबा हुसैन के ख़ाके - बरसात के मौसम में आपने कभी यह मंजर देखा होगा कि एक तरफ़ तो हलकी सी फुहार पड़ रही है और दूसरी तरफ़ आसमान पर धुला-धुलाया सूरज छमाछम चमक रहा है। इस मंजर को अपने जेहन में ताज़ा कर लीजिए तो समझिए कि आप इस मंजर में नहीं, (राजिंदर सिंह) बेदी साहब की शख़्सियत में काफ़ी दूर तक चले गये हैं।जब तकरीर के लिए उनका नाम पुकारा गया, तो वो (सज्जाद जहीर) हाजिरीन के सामने वाली कतार में से उठकर यूँ सुबुक खरामी के साथ माइक पर आये कि उन्हें देखने की सारी आरजू का सत्यानाश हो गया। उनके चलने में ऐसी नर्मी, आहिस्तगी, ठहराव और धीमापन था कि एकबारगी मुझे यह वजह समझ में आ गयी कि हमारे मुल्क़ में इन्क़िलाब के आने में इतनी देर क्यों हो रही है।इसके बाद मोहतरिमा ने हारमोनियम सँभालकर जो गाना शुरू किया तो समा बाँध दिया। इस क़दर ख़ूबसूरत आवाज़ थी कि बस कुछ ना पूछिए। मैं दाद देते-देते थक सा गया मगर शह्रयार ख़ामोश बैठे रहे। मैंने आहिस्ता से कान में कहा, शह्रयार क्या मजाक है? दाद तो दीजिए। जवाबन आहिस्ता से बोले, कैसे दाद दूँ? कमबख़्त ने मेरी ही ग़ज़ल छोड़ दी है। कहीं अपने ही क़लाम पर दाद दी जाती है?'ये कुछ उदाहरण हैं उर्दू के शीर्ष व्यंग्यकार मुज्तबा हुसैन की तीख़ी, पर हार्दिक शैली के, जिसकी चाशनी में डुबो कर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में आये अदीबों और अदब पसन्दों के जीवन्त रेखाचित्र प्रस्तुत किये हैं। इनमें राजिंदर सिंह बेदी, कृश्न चंदर और ख़्वाजा अहमद अब्बास जैसे कथाकार और फिल्म निर्माता हैं तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शायर और क़तील शिफाई जैसे कवि भी। खुशवंत सिंह, एम.एफ. हुसैन, इंद्रकुमार गुजराल और देवकीनंदन पांडेय जैसी शख़्सियतें भी हैं। हर खाका अपने आप में बेजोड़ है और लेखक की चुलबुली शैली, गहराई और गरमाहट का शाहकार नमूना। और आख़िर में आत्मश्राद्ध, जिसमें वे ख़ुद अपना ही कार्टून बनाते हैं।

मुज्तबा हुसैन - उर्दू के शीर्षस्थ व्यंग्यकार मुज्तबा हुसैन अपनी दिलफ़रेब सादगी और मीठी चुभन के लिए ख़ास तौर पर जाने जाते हैं। उनका जन्म तत्कालीन हैदराबाद राज्य के गुलबर्गा ज़िले में 1936 में हुआ था। ओस्मानिया विश्वविद्यालय से बी.ए. करने के बाद उन्होंने 1956 में उर्दू दैनिक सियासत में काम करना शुरू किया। उनकी व्यंग्य यात्रा की शुरुआत इसी पत्र में व्यंग्य स्तम्भ लिखने से हुई। यह स्तम्भ पाठकों में बहुत जल्द लोकप्रिय हो गया। बाद में मुज्तबा हुसैन एनसीईआरटी, दिल्ली के प्रकाशन विभाग में सम्पादक बने। उर्दू के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए भारत सरकार द्वारा गठित इंद्रकुमार गुजराल समिति के सदस्यों में वे भी एक थे। उत्कृष्ट व्यंग्य, लेख तथा यात्रा वृत्तान्त लेखन के लिए ग़ालिब पुरस्कार तथा आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश की उर्दू अकादमियों के पुरस्कारों सहित अनेक सम्मानों से उन्हें नवाजा जा चुका है। 2007 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री अलंकरण प्रदान किया। अब तक मुज्तबा हुसैन की अठारह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी अनेक रचनाओं का अनुवाद हिन्दी, अंग्रेज़ी तथा कई अन्य भाषाओं में हुआ है।

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