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Mum'bhai'

by Vivek Agarwal
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352294350
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 328
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): Sociology / General

मुम्बई माफिया पर कुछ लिखना, वह भी तब, जब बहुत कुछ कहा-सुना-लिखा-पढ़ा जा चुका हो। एक चुनौती है। उससे अधिक चुनौती यह है कि कितना सटीक और सधा हुआ काम आपके हाथ में आता है। कोशिश की है कि एक ऐसी किताब आपके लिए पेश करूँ जिसमें मुम्बई के स्याह सायों के संसार के ढेरों राज सामने आयें। पत्रकार होना एक बात है, एक पुस्तक की शक्ल में सामग्री पेश करना और बात ।हर दिन जल्दबाजी में लिखे साहित्य यानी ख़बरों की कुछ दिनों तक ही कीमत होती है। आपके लिए सहेज कर रखने वाली एक किताब में वह सब होना चाहिए, जो उसे संग्रहणीय बना सके। देश का सबसे भयावह भूमिगत संसार पूरे विश्व में जा पहुँचा है। ये तो ऐसे यायावर प्रेत हैं, जिनकी पहुँच से अछूता नहीं है। कुछ भीसुकुर नारायण बखिया, लल्लू जोगी, बाना भाई, हाजी मिर्ज़ा मस्तान, करीम लाला तक तो मामला महज़ तस्करी का था । वरदराजन मुदलियार ने कच्ची शराब से जुआखानों तक, चकलों से हफ़्तावसूली तक, वह सब किया, जिसे एक संगठित अपराधी गिरोह का बीज पड़ने की संज्ञा दे सकते हैं। उसके बाद मन्या सुर्वे, आलमज़ेब, अमीरजादा, पापा गवली, बाबू रेशिम, दाऊद इब्राहिम, अरुण गवली, सुभाष ठाकुर, बंटी पांडे, हेमन्त पुजारी, रवि पुजारी, सन्तोष शेट्टी, विजय शेट्टी तक न जाने कितने किरदार अँधियाले संसार में आ पहुँचे, जिनके अनगिनत राज कभी फ़ाश न हो सके। मुं'भाई' में आपको मिलेगी इनकी छुपी दुनिया की ढेरों जानकारी। इस रक्तजीवियों के संसार में कुछ ऐसा घटित होता रहा है, जो सम्भवतः कभी रोशनी में न आया।मुं 'भाई' में ऐसे अछूते विषय हैं, जिनके बारे में किसी ने सोचा न होगा। इस ख़ूरेजी दुनिया के विषयों पर पढ़ना कितना रुचिकर होगा, यह तो आपकी रुचि पर ही निर्भर है।मुं'भाई' में समाहित किया है, कुछ ऐसा जो सम्भवतः पहली बार दुनिया के सामने आया है। किसी को यह पता ही नहीं है कि आख़िरकार इन आतंकफरोशों के गिरोह की संरचना कैसी है, पुराने और नये वक़्त का फ़र्क क्या है, वे कहाँ-कहाँ जा पहुँचे हैं, उनके अड्डे कैसे हैं, रिटायर होने के बाद क्या करते हैं गिरोहबाज... वगैरह-वगैरह... और भी ढेर सारे वगैरह हैं ।इसका लेखन क़िस्सागोई की तकनीक में पत्रकारिता का तड़का लगा कर पेश किया है। यह पुस्तक मनोरंजन का मसाला न होकर मुम्बई के गिरोहों और उनके तमाम किरदारों की दुनिया का जीवन्त दस्तावेज़ है। विश्वास है कि पाठकों के लिए ये जानकारियाँ अनूठी होंगी । पुस्तक में मुम्बई के गिरोहबाजों, प्यादों, ख़बरियों में प्रचलित शब्दों व मुहावरों का पूरा ज़ख़ीरा ही सबसे अन्त में है ।ये मुं'भाई' श्रृंखला की पहली पुस्तक है। इसके साथ की दो और पुस्तकें हैं, जो बस आगे-पीछे प्रकाशित होने जा रही हैं। उसके बाद कुछ और पुस्तकें इसी शृंखला में पेश करेंगे।

विवेक अग्रवालविवेक अग्रवाल पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से अपराध, क़ानून, सैन्य, आतंकवाद और आर्थिक अपराधों की खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं। वह पत्रकारिता के हर आयाम के लिए काम कर रहे हैं। एकीकृत मध्यप्रदेश में सन् 1985 में बतौर स्वतन्त्र पत्रकार स्थानीय व राष्ट्रीय अख़बारों में सक्रिय हुए थे।मुख्यधारा के अख़बारों में विवेक ने 1992 में मुम्बई के 'हमारा महानगर' से काम शुरू किया। सन् 1993 में वे राष्ट्रीय अख़बार 'जनसत्ता' से बतौर अपराध संवाददाता जुड़े और मुम्बई माफिया पर दर्जनों खोजी रपटें प्रकाशित कीं। एक दशक बाद उन्होंने देश के पहले वैचारिक चैनल 'जनमत' से समाचार जगत के नये आयाम में क़दम रखा, जो बाद में 'लाइव इंडिया' बना। महाराष्ट्र के सबसे शानदार चैनल 'मी मराठी' की ख़बरों के प्रमुख रहे। खोजी पत्रकार के रूप में उन्होंने एक ज़बरदस्त पारी देश के इंडिया टीवी में भी खेली। महाराष्ट्र व गोवा राज्य प्रभारी के रूप में वह 'न्यूज़ एक्सप्रेस' की आरम्भिक टीम का हिस्सा बने। इन चैनलों में भी विवेक ने खूब खोजी ख़बरें कीं।मुम्बई माफिया और अपराध जगत पर उनकी विशेषज्ञता का लाभ हॉलैंड के मशहूर चैनल ‘ईओ' तथा 'एपिक' भी उठा चुके हैं। कुछ समय वह फ़िल्म एवं टीवी धारावाहिक लेखन को भी समर्पित कर चुके हैं।विवेक अग्रवाल अब लेखन और वृत्तचित्रों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। वह कुछ अख़बारों और चैनलों के साथ बतौर सलाहकार जुड़े हैं। वह अब अपनी सेवाएँ बतौर विशेषज्ञ, चैनल, अख़बार, पत्रिका आरम्भ करने और उन्हें स्थापित करने के लिए प्रदान कर रहे हैं।

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