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Nagarjun Samvad

by Vijay Bahadur Singh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350001424
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 168
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): Memoirs

नागार्जुन संवाद - बौद्धिक क्षेत्रों में तो ज़बरदस्त ग़ुलामी चल रही है। कौन कितना अपने को कठमुल्ला साबित कर सकता है। पराये साहित्य का जूठन ले कर कूड़ा परोस सकता है।प्रगतिशील कवियों को देखो, वे कितने सिकुड़ते जा रहे हैं। अपने ही प्रतीकों को छोड़ रहे हैं। नेरुदा और चे ग्वारा किस तरह अपने प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। इसे न सीख कर ये लोग अपने प्रतीकों से नफ़रत करते हैं और बात करते हैं जातीय इतिहास की।हमने अपनी भाभी से एक बार कहा, पाँच साल के लिए मैं महिला बनना चाहता हूँ। हाँ महिला, तो भाभी ने कहा – पाँच साल ही क्यों? तो मैंने कहा- पाँच साल में पहला काम तो यह कि मैं माँ बनूँगा तो मातृत्व के जो आँसू होते हैं न, वो मरदों की रुलाई के जो विषाक्त आँसू होते हैं, उससे अलग होते हैं, मैं निकट से उनका अनुभव करूँगा। जैसे बहुत बड़ा अन्यायी है इलाक़े का बहुत बड़े दुष्ट को तत्काल समाप्त करने के लिए नक्सलवाद बड़ा उपयोगी है। ये त्वरित चिकित्सा हुई। इसको समाज मूक सहमति देता है। गीता का कर्मयोग आज यही है।महिलाएँ वियोग और अपमान में से वियोग का वरण तो कर लेंगी पर अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पातीं। वे धीरे-धीरे इसका बदला लेती हैं। जैसे-जैसे उनकी समझदारी बढ़ती जाती है, उनके प्रतिशोध का रूप और गहरा होता जाता है।तो ऐसे थे बाबा नागार्जुन – जितने सीधे और सहज उतने ही प्रखर और बेबाक। उनका जीने का ढंग अपना था, सोचने का तरीक़ा अपना था और रचना करने की विधि तो अपनी थी ही। नागार्जुन न किसी वाद से बँधे थे, न किसी पैटर्न से। साहित्य की सभी विधाओं में उन्होंने अपनी अलग लीक बनायी और एक नयी चमक पैदा की। शास्त्र और लोक का ऐसा रचनात्मक संयोग विरल है। वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह की यह पुस्तक घरेलू माहौल में नागार्जुन से निरन्तर संवाद की असम्पादित डायरी है। इसके खुले पन्नों पर नागार्जुन के बहुआयामी व्यक्तित्व की लगभग सभी परतें पढ़ी जा सकती हैं, जिसके बिना इस विलक्षण सर्जक को समझ पाना असम्भव है।

विजय बहादुर सिंह - 16 फ़रवरी, 1940 को उत्तर प्रदेश के फ़ैजाबाद अब आंबेडकर नगर के एक गाँव जयमलपुर में जन्मे विजय बहादुर सिंह ने अध्यापन कार्य के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियों की सृष्टि कर सर्वभारतीय प्रतिष्ठा प्राप्त की है। उनके स्वतन्त्र आलोचनात्मक ग्रन्थ हैं 'बृहत्त्रयी' (प्रसाद, निराला, पंत की कविता पर एकाग्र), 'नागार्जुन का रचना-संसार', 'नागार्जुन संवाद', 'कविता और संवेदना', 'उपन्यास : समय और संवेदना', 'आलोचक का स्वदेश' (आचार्य नंददुलारे वाजपेयी की साहित्यिक जीवनी)।आठ खंडों में 'भवानीप्रसाद मिश्र ग्रन्थावली', चार खंडों में 'दुष्यंत कुमार ग्रन्थावली' तथा आठ खंडों में 'नंददुलारे वाजपेयी ग्रन्थावली' के सम्पादन कार्य के अलावा विजय बहादुर सिंह ने 'जनकवि' नाम से प्रगतिशील कवियों केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और मुक्तिबोध - की कविताओं का सम्पादन किया है। आलोचना की दुरूह बौद्धिकता से सम्बद्ध रहते हुए भी कविता के भावमय जगत में प्रवेश करने में विजय बहादुर सिंह को कोई कठिनाई नहीं हुई। 'मौसम की चिट्ठी', 'पतझर की बाँसुरी', 'पृथ्वी का प्रेमगीत' (तीन कवियों का संयुक्त संकलन), लंबी आख्यानक कविता 'भीम बैठका' और 'शब्द जिन्हें भूल गई भाषा' उनकी काव्य कृतियाँ हैं। 'आज़ादी के बाद के लोग' और 'आओ खोजें एक गुरु' उनकी समाज और शिक्षा से जुड़ी कृतियाँ हैं।

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