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Paanch Behatreen Kahaniyan

by Yashpal
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789350723326
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 68
  • Original Price: INR 75.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 100 grams
  • BISAC Subject(s): General

पाँच बेहतरीन कहानियाँ - “अब तक निगम और माया में जो बात होती, सभी के सामने और ख़ूब ऊँचे स्वर में होती थी, परन्तु अब अकेले में करने लायक बात भी हो गयी। असाधारण और विशेष में ही तो सुख होता है। जिसे पाने में कठिनाई हो, वही पाने की इच्छा होती है। अकेले में और दूसरों के कान की पहुँच से परे होने पर निगम कह बैठता— "वह तस्वीर आपने लौटायी नहीं?"

यशपाल - यशपाल का जन्म 3 दिसम्बर, 1903 में फिरोज़पुर छावनी के एक खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता हीरालाल एवं माता प्रेमा देवी आर्यसमाजी थे। पंजाब के क्रान्तिकारी नेता लाला लाजपतराय से उनका सम्पर्क हुआ तो वे बड़े होकर स्वाधीनता आन्दोलन से भी जुड़े। भगतसिंह से यशपाल की घनिष्ठता थी। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से स्नातक किया तथा नाटककार उदयशंकर से उन्हें लेखन की प्रेरणा मिली। देशभक्त क्रान्तिकारियों से प्रेरित होकर इन्होने क्रन्तिकारी गतिविधियों में भाग लिया। जेल गये, और वहाँ बरेली जेल में प्रकाशवती से विवाह किया। वे एक समृद्ध कहानीकार, निबन्धकार, नाटककार हैं। यशपाल मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित रहे हैं इसलिए ही उनकी रचनाओं पर मार्क्सवाद का प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है। वे एक यथार्थवादी रचनाकार रहे हैं। वे सामाजिक रुढ़ियों, पुरातनपन्थी विचारों के घोर विरोधी रहे हैं। वे प्रगतिशील विचारक थे और यह उनके व्यक्तित्व में झलकता है।वे एक निर्भीक वक्ता, स्पष्टवादी और राष्ट्रवादी लेखक थे। अंग्रेज़ों के विरुद्ध आन्दोलन करते हुए अनेक बार जेल गये। क्रान्तिकारी दल से जुड़े रहने के कारण उनमें थोड़ी उग्रता देखी गयी। यशपाल भारतीयता के साथ-साथ पाश्चात्य विचारधारा से भी प्रभावित रहे हैं। यशपाल एक समर्थ लेखक रहे हैं। 1940 से 1976 तक उनके 16 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 17वाँ संग्रह मृत्युपरान्त प्रकाश में आया जिसमें कुल 206 कहानियाँ संग्रहित हैं। यशपाल ने तीन एकांकी, 10 निबन्ध संग्रह, 3 संस्मरण पुस्तकें तथा 8 बड़े व 3 लघु उपन्यास लिखे, जो प्रकाशित हो चुके हैं। 'सिंहावलोकन' नाम से उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी तथा 'विप्लव' नामक पत्रिका का सम्पादन भी किया।

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