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Padhiye To Aankh Paiye

by Ramkumar Krishak
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789394902909
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 176
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 162 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू की पारम्परिक ग़ज़ल से अलग अपनी पहचान देनेवालों में रामकुमार कृषक का विशिष्ट स्थान है। वृहत्तर सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों और विचार के गद्यात्मक विस्तार को उन्होंने जिस हुनर से ग़ज़ल में बाँधा, वह उन्हें हिन्दी के अग्रणी ग़ज़लकारों की पक्ति में ला देता है।

तत्सम, तद्भव और आम बोलचाल की शब्दावली में कही गई उनकी ग़ज़लों में उनके विशिष्ट भाषा-व्यवहार के अलावा वह सघर्ष भी दिखाई देता है जिससे हर ईमानदार रचनाकार अपने अनुभव को शब्द देते समय गुज़रता है। अपनी बात को उसकी समग्र त्वरा के साथ पाठक तक सम्प्रेषित करने के लिए वे कई बार नए ढंग के अपने रदीफ़ व काफ़ियों से ग़ज़ल की विधागत सीमाओं को विस्तृत भी करते हैं; लेकिन कहीं भी ग़ज़ल के अनुशासन को भंग नहीं होने देते, न उसकी उस तरलता को जो ग़ज़ल की लोकप्रियता का आधार रही है।

इस संग्रह में उनकी 1978 से अब तक की चुनिन्दा ग़ज़लें संकलित हैं जो सिर्फ़ रचनाकार के रूप में उनके विकास-क्रम को ही नहीं दर्शातीं, बल्कि इस पूरे अन्तराल में फैले हमारे सामाजिक-राजनीतिक इतिहास का भावनात्मक रोज़नामचा भी पेश करती हैं। समाज में लगातार बढ़ती ग़ैरबराबरी, लोकतांत्रिक मूल्यों से विचलन, सत्ता और सत्ताधारियों का लगातार विकृत होता चरित्र, धार्मिक आस्थाओं के दुरुपयोग, बाज़ार का आतंकी विस्तार और उसके बरक्स रोज़ और असहाय, और अकेला होता मनुष्य; यानी ऐसा कुछ भी नहीं है जो पिछले चार दशक के दौरान देश के आम आदमी ने झेला हो और रामकुमार कृषक ने उसे अपनी ग़ज़ल में अंकित न किया हो।

हिन्दी ग़ज़ल को एक समर्थतर और स्वायत्त विधा मानने वालों के लिए इन ग़ज़लों से गुज़रना ज़रूरी है।

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