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Pakistan Diary

by Zahida Hina
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352291557
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 150
  • Original Price: INR 100.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): Memoirs

पाकिस्तान डायरी - उस वक़्त से अब तक एक साल गुज़र चुका है, ‘दैनिक भास्कर’ में हर हफ़्ते ‘पाकिस्तान डायरी’ छपती है और इसको पढ़ने वाले मुझे दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद में मिलते हैं। दिल्ली की मुख्यमन्त्री श्रीमती शीला दीक्षित के घर के लॉन पर चाय का लुत्फ़ उठाते हुए और वहाँ राजस्थान के एक अस्सी साला मेहमान अदीब श्री विजयदान देथा मुझे पहचान रहे हैं, मेरे लेखन की दाद दे रहे हैं और मेरा सर उनके आशीर्वाद से झुक रहा है। बचपन में हम सब भी चाँद तक पहुँचने के लिए दिल ही दिल में कैसी सीढ़ियाँ बनाते हैं, ‘दैनिक भास्कर’ में छपने वाली ‘पाकिस्तान डायरी’ भी एक ऐसी ही सीढ़ी है, जिसे मैंने शब्दों से बनाया है और इस पर से होकर हिन्दुस्तानी जनता के दिलों में उतरने की कोशिश की। उन्हें बताना चाहा है कि आपके और हमारे दु:ख एक जैसे हैं। इन दु:खों से निबटने का एक ही तरीक़ा है कि हर बन्दूक़ की नाल में हम गिरह लगा दें और तोप की नाल में एक फ़ाख़्ता रख दें- अमन की फ़ाख़्ता। ‘पाकिस्तान डायरी’ अगर किताब की शक्ल में आप तक पहुँच रही है। तो इसका श्रेय अरुण माहेश्वरी को जाता है जो इतवार के रोज़ उसे पढ़ते हैं और ख़ुश होते हैं और अब उन्होंने दूसरों को भी इस ख़ुशी में शामिल करने का फ़ैसला किया है।–ज़ाहिदा हिना

ज़ाहिदा हिना - बिहार के शहर सहसराम में पैदा हुईं और कराँची में रहती हैं। सोलह वर्ष की उम्र से वे अदब और शहाफ़त से जुड़ी हुई हैं। आज वे उर्दू की सफे़-अव्वल की लिखने वाली समझी जाती हैं। उनकी सात किताबें छप चुकी हैं, जिनमें से पाँच हिन्दुस्तान में भी छप चुकी हैं। इनकी कहानियों के अनुवाद अंग्रेज़ी, जर्मन, रूसी, हिन्दी, बांग्ला, सिंधी, गुरुमुखी, मराठी और पश्तो में भी हुए हैं। उनकी एक कहानी का अंग्रेज़ी अनुवाद उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज अहमद फ़ैज ने किया है। इनकी गिनती पाकिस्तान के सफे-अव्वल के कॉलमनिगारों में भी होती है। वह अठारह वर्षों से रोजनामा 'जंग', उर्दू न्यूज 'जद्दा' और सिंधी के अख़बार 'इबरत' के लिए साप्ताहिक कॉलम लिख रही हैं। 2005 से उन्होंने 'दैनिक भास्कर' के लिए 'पाकिस्तान डायरी' लिखनी शुरू की और उनके इन्हीं कॉलमों का संग्रह आपके हाथों में है। उनका उपन्यास 'न जुनूँ रहा न परी रही' देश के विभाजन और ख़ूनी रिश्तों के बिखर जाने की उदास कर देने वाली तस्वीर है। वाणी प्रकाशन ने इस उपन्यास को वर्ष 2004 में छापा था। इन्हें अनेक पुरस्कार और सम्मान दिये जा चुके हैं। 2001 में राष्ट्रपति के. आर. नारायणन के हाथों उन्हें सार्क लिटररी अवार्ड 2001 मिला।

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