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Patheya

by Jawaharlal Kaul
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789386001269
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 168
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

‘दिव्य प्रेम सेवा मिशन’ की कल्पना जैसे अनायास ही साकार हुई, वैसे ही मेरा उससे जुड़ना भी अनायास ही था। आत्म-साक्षात्कार के लिए निकले एक साधक के सामने अचानक कुष्ठ रोगियों के रूप में समाज खड़ा हो गया और ‘दिव्य प्रेम मिशन’ का जन्म हुआ। इस पुस्तक में पहाड़ों की संवेदनशीलता और पीड़ा की बातें हैं, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने अरण्य नाम दिया, उन पर समाज और शासन के बीच तलवारें खिंचने की आशंकाएँ हैं, हिमानियों के लुप्त होने के खतरे, विकास के नाम पर प्रकृति के दोहन को शोषण में बदलने के कुचक्रों की दास्तान हैं। तीर्थों को निगलते पर्यटन स्थल, मलिनता के बीच तीर्थों की पवित्रता के दावे, अपनों से ही त्रस्त गंगा और ऐसी ही अनेक विचारणीय बातें हैं। बीच-बीच में महान् परिव्राजक विवेकानंद, योगी अरविंद, युगांतरकारी बुद्ध और स्वच्छता के पुजारी गांधी सरीखे लोगों की याद भी आती रही; जो पाथेय मिला, वह भौतिक नहीं, बौद्धिक और आध्यात्मिक था। वह बाँटकर ही फलित होता है, इसलिए आपके सामने है।

26 अगस्त, 1937 को जम्मू-कश्मीर के एक सुदूर क्षेत्र में जन्म। श्रीनगर में एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की। श्रीनगर के ही एक स्कूल में अध्यापक हो गए। तभी हिंदुस्थान समाचार के श्री बालेश्वर अग्रवाल ने अपनी समाचार समिति में उन्हें एक प्रशिक्षु पत्रकार रख लिया। अगले वर्ष अज्ञेयजी ने अपने नए प्रयोग ‘दिनमान’ के लिए उन्हें चुना। दो दशक तक ‘दिनमान’ के साथ काम करने के पश्चात् ‘जनसत्ता’ दैनिक में श्री प्रभाष जोशी के सहयोगी बने। 78 वर्ष की उम्र में भी उनका लिखना जारी है। उनका मानना है कि जब तक व्यक्ति जीवित है, उसके सोचने पर पूर्ण विराम तो नहीं लगता। सोचने पर नहीं लगता तो कहने-लिखने पर क्यों लगेगा? लिखना जीवन का लक्षण है, उसकी प्रासंगिकता है। अपनी पुस्तक ‘हिंदी पत्रकारिता का बाजार भाव’ में वे लिखते हैं कि पत्रकारिता अब एक ऐसा उद्योग हो गया है, जहाँ प्रमुख संचालक विज्ञापनदाता हो गया है, जो न तो पाठक है, न संपादक और न ही संस्थापक। उन्हें वर्ष 2016 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया।

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