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Pramanu Kraar Ke Khatre Urja Ke Bahane Samprabhuta Ka Sauda

by Ed. by Mahasweta Devi , Arun Kumar Tripathi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181438959
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 164
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

नाभिकीय करार कर यूपीए सरकार और विपक्षी दलों के बीच खींचातानी और जोड़-तोड़ की आतुरता और वामपन्थियों के विरोध ने कम-से-कम इतना तो साफ़ करही दिया है कि यह मुद्दा जितना संवेदनशील है, उतना ही जटिल भी। ऊपर से, इस परिदृश्य पर अमरीका के राष्ट्रपति पद के चुनावों की मँडराती हुई छाया और भारतीय संसद के आगामी चुनावों के नजदीक आते जाने की भी अपनी भूमिका है। फिलहाल इन नाटकीय दाँवपेचों से अलग मामला भारत के अमेरिका करण और अमेरिका की साम्राज्यवादी इच्छा को मंजूरी देने और उसके विरोध का है। यह बात अब शीशे की तरह साफ है कि इस समझौते का परमाणु ईंधन या ऊर्जा जरूरत से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है। दरअसल पंडित जवारह लाल नेहरू ने जिस तरह से भाग्य वधू से भारत को आजाद कराने की एक प्रतिज्ञा की थी और उसे 15 अगस्त, 1947 को पूरा किया, उसी तरह मनमोहन सिंह और उनके पीछे खड़े भारतीय मध्यवर्ग ने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को भारत के अमेरिकी करण का एक वचन दिया था और उसे वे हर कीमत पर 2008 में पूरा करके मानेंगे। भारतीय राजनीति में शायद उसे रोक पाने की सामर्थ्य नहीं दिखती। वामपंथी दलों ने अपनी संसदीय ताकत के बूते पर जितना विरोध करना था किया। अब यह मामला भारतीय जनता के हाथों में है कि वह अपनी आन्दोलन की विराट शक्ति और मताधिकार के प्रयोग से इस प्रक्रिया को कहाँ तक रोक सकती है। यह संकलन उसी उद्देश्य के लिए चेतना को जगाने का एक प्रयास और साम्राज्यवाद का विरोध करने वाली ताकतों को एकजुट करने का एक आह्वान है। और इसीलिए इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस अंक में नाभिकीय ऊर्जा की साम्राज्यवादी राजनीति, उसके आर्थिक और वैज्ञानिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की गयी है। यह पुस्तक हिन्दी पाठकों की तथ्यों और विश्लेषण की बौद्धिक भूख को लेकर तैयार की गयी है, क्योंकि उसके तथाकथित मित्र के रूप में तेजी से बढ़ रहा प्रिंट या इलैक्ट्रॉनिक मीडिया उसे इन गम्भीर और बेहद जरूरी मुद्दों की जानकारी देने से ही परहेज करता है तो विश्लेषण की बात ही दूर है।

महाश्वेता देवीबांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है। यही उनका विशिष्ट क्षेत्र भी बना और यहीं चल रहे शोषण के विरुद्ध उन्होंने बार-बार आवाज़ बुलन्द की।उपन्यास, कहानी, नाटक, बाल साहित्य की कोई 175 पुस्तकें प्रकाशित। पद्मश्री, साहित्य अकादेमी, मैग्सेसे, ज्ञानपीठ आदि पुरस्कारों से सम्मानित।-------अरुण कुमार त्रिपाठी9 अक्टूबर, 1961 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक किसान परिवार में जन्म। लखनऊ विश्वविद्यालय में एल-एल.एम. की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता। मानवाधिकार, दलित, स्त्री, पर्यावरण और आदिवासी आन्दोलनों से गहरा नाता। 'जनसत्ता' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक दशक तक पत्रकारिता करने के बाद 'हिन्दुस्तान' अखबार में संयुक्त सम्पादक रहे। आजकल स्वतन्त्र लेखन। वाणी प्रकाशन की 'आज के प्रश्न' शृंखला में नियमित लेखन। प्रकाशित कृतियाँ - 'कल्याण सिंह', 'मेधा पाटकर' और 'कट्टरता के दौर में'। '1857' पर नयी पुस्तक की तैयारी में।

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