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Pratidan

by Rangeya Raghav
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350005057
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 200
  • Original Price: INR 350.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): General

प्रतिदान - महाभारत के पात्रों और घटनाओं पर हिन्दी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं में भी महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखे गये हैं। इन सब के बीच रांगेय राघव का प्रस्तुत उपन्यास 'प्रतिदान' का विशेष महत्त्व है। 'प्रतिदान' माध्यम से प्राचीन भारत के इतिहास तथा संस्कृति के विशेषज्ञ लेखक ने द्रोण की दरिद्रता से उसके वैभव की कथा कही है । द्रोण एक विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न ब्राह्मण था । लेकिन अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद जब उसने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया, तो उसके पास साधनों का दारुण अभाव था। उस समय तक ब्राह्मण विद्वान क्षत्रिय राजाओं की सेवा स्वीकार कर सम्पन्न जीवन जीना शुरू कर चुके थे, पर द्रोण को यह स्वीकार्य नहीं था। ब्राह्मण सत्ता के साथ किसी प्रकार का समझौता करना उसे अपनी गरिमा के विरुद्ध लगता था । फलस्वरूप उसे निरन्तर अभाव और उपेक्षा का जीवन जीना पड़ा।जब उसका पुत्र अश्वत्थामा एक कटोरी दूध तक के लिए बिलखने लगा, तब द्रोण टूट गया। वह अपना गाँव छोड़ कर अपने सहपाठी राजा द्रुपद से सहायता माँगने के लिए पांचाल पहुँचा, तो द्रुपद भी उसका घोर अपमान किया। दरिद्रता और अपमान की पीड़ा ने द्रोण को कुरु वंश के राजकुमारों का शिक्षक बनने को बाध्य कर दिया। पांडव और कौरव उससे शस्त्र का ज्ञान प्राप्त करने लगे । इस बीच एकलव्य, कर्ण आदि के अनेक रोमांचकारी प्रसंग घटित होते हैं और अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के लिए द्रोण को अनेक छल करने पड़ते हैं। अन्त में, अर्जुन ही द्रुपद को रस्सियों से बाँध कर गुरु द्रोण के पैरों पर झुकवाता है और द्रोण की प्रतिशोध भावना तृप्त होती है।रांगेय राघव का उद्देश्य सिर्फ कहानी कहना नहीं है। उन्होंने इसके माध्यम से महाभारत के प्रारम्भिक काल को, उसकी तमाम विविधता और जटिलता के साथ, प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। इस प्रक्रिया में उन्होंने अनेक मिथक तोड़े हैं और अनेक भ्रमों का निवारण किया है। लेकिन 'प्रतिदान' अन्ततः एक उपन्यास ही है लेखक के शब्दों में 'महाभारतकालीन पौराणिक पृष्ठभूमि पर एक अर्वाचीन उपन्यास' ।

रांगेय राघव17 जनवरी, 1923 को जन्म आगरा में मूल नाम टी. एन. वी. आचार्य (तिरुमल्लै नम्बाकम् वीर राघव आचार्य) । कुल से दाक्षिणात्य लेकिन ढाई शतक से पूर्वज वैर (भरतपुर) के निवासी और वैर, बारोली गाँवों के जागीरदार ।शिक्षा आगरा में। सेंट जॉन्स कॉलेज से 1944 में स्नातकोत्तर और 1948 में आगरा विश्वविद्यालय से गुरु गोरखनाथ पर पी एच. डी. । हिंदी, अंग्रेजी, बृज और संस्कृत पर असाधारण अधिकार ।13 वर्ष की आयु में लेखनारम्भ। 23-24 वर्ष की आयु में ही अभूतपूर्व चर्चा के विषय। 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद लिखे रिपोर्ताज – 'तूफानों के बीच' से - चर्चित |साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, संगीत और पुरातत्त्व में विशेष रुचि । साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में सिद्धहस्त । मात्र 39 वर्ष की आयु में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, सभ्यता और संस्कृति पर शोध व व्याख्या के क्षेत्रों को 150 से भी अधिक पुस्तकों से समृद्ध किया । अपनी अद्भुत प्रतिभा, असाधारण ज्ञान और लेखन-क्षमता के लिए सर्वमान्य अद्वितीय लेखक । संस्कृत रचनाओं का हिन्दी, अंग्रेजी में अनुवाद । विदेशीसाहित्य का हिन्दी में अनुवाद | 7 मई, 1956 को सुलोचनाजी से विवाह । 8 फरवरी, 1960 को पुत्री सीमन्तिनी का जन्म। अधिकांश जीवन आगरा,वैर और जयपुर में व्यतीत। आजीवन स्वतन्त्र लेखन ।हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार (1951), डालमिया पुरस्कार (1954), उत्तर प्रदेश सरकार पुरस्कार (1957 व 1959), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) तथा मरणोपरान्त (1966) महात्मा गांधी पुरस्कार से सम्मानित । विभिन्न कृतियाँ अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित और प्रशंसित। लम्बी बीमारी के बाद 12 सितम्बर, 1962 को बम्बई में देहान्त ।

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