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Raajneeti Ke Kavitatv

by Ed. by Dr. Mahendra Nath Dubey
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789352293711
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 160
  • Original Price: INR 175.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): General

राजनीति के कवित्त - कवि देवीदास हिन्दी के उन क्रान्तिकारी कवियों में हैं जिनके विषय में हिन्दी-साहित्य-इतिहास ग्रन्थों में समुचित मात्रा में सूचना उपलब्ध नहीं है। उपलब्ध सामग्री भी बिखरी-बिखरी, अनमेल है। उनकी रचना युग से इतने आगे है कि उसका मूल्यांकन भी नहीं किया जा सका। भक्तिकाल के अन्तिम पर्व में जब अचानक कवि दरबारों की ओर खिंचते हुए राजाओं के गुणकीर्त्तन और सुन्दरियों के नाकनक्श की कमनीयता बखानने में ही कवि कर्म की सफलता समझने लगे थे, तब उस युग में राजाश्रय को ठोकर मारते हुए सामान्य जनजीवन की समस्याओं को लेते हुए; उनके हल का एकमात्र उत्कृष्ट साधन राजनीति को ही मानते हुए; कवि देवीदास ने राजाओं के लिए राजनीति के पाठ तो रचे ही; साधारण जनता को भी राजनीति के गुरुओं से दीक्षित करने की कोशिश की।प्रस्तुत रचना-राजनीति के कवित्त-में विविध हस्तलेखों की तुलनात्मक समीक्षा के आधार पर पाठ वैज्ञानिक निकष पर कसे हुए उनके कवित्तों के प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किये गये हैं। जिनसे हिन्दी साहित्य के मध्यकाल की मान्यताओं को एक ज़ोरदार झटका लगता है। उसे रीति श्रृंगार मात्र की समझने-समझाने की सीमा अपने आप चटक जाती है।

डॉ. महेन्द्र नाथ दुबे - 'राजनीति के कवित्त'-रचना का पाठवैज्ञानिक सम्पादन किया है डॉ. महेन्द्र नाथ दुबे ने। छात्र जीवन में पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के निर्देशन में सम्पादित होनेवाले 'रामचरितमानस' के काशिराज संस्करण की सम्पादन योजना को निकट से निरखने-परखने का अवसर मिलने; फिर पाइअ सद्द महण्णवो (प्राकृत पैंगलम) के सम्पादक डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के सहयोगी के रूप में सम्पादन कार्य करने, पं. करुणापति त्रिपाठी के निर्देशन में बोली- विज्ञान पर शोध करने डॉ. शिवप्रसाद सिंह द्वारा संपादित 'कीर्तिलता और अवहट्ठ भाषा' के सम्पादन को देखने के अनन्तर पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी एवं बंगला के विश्रुत सम्पादक विद्वान डॉ. वीमान बिहारी मजुमदार और सुकुमार सेन के प्रोत्साहन पर विद्यापति के समस्त गीतों का-'गीत : विद्यापति'-नाम से सम्पादन कर प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके डॉ. दुबे को डॉ. माता प्रसाद गुप्त द्वारा- 'सूरसागर' के सम्पादन के कार्य को नये पाठवैज्ञानिक निकष पर परिष्कृत कर प्रस्तुत करने का कार्य सौंपा गया। इसी क्रम में डॉ. दुबे ने पुराने हस्तलेखों में उपलब्ध पाठों की पाठ-वैज्ञानिक जाँच-परखकर प्रामाणिक पाठ के सम्पादन का गुर सिखानेवाला महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ- साहित्य की प्रामाणिक पहचान और पाठ विज्ञान' रचा; जो पाठवैज्ञानिक समीक्षा का एकमात्र पथ-प्रदर्शक ग्रन्थ है। अपनी पाठवैज्ञानिक दृष्टि से डॉ. दुबे ने जो हिन्दी के मध्यकाल के हस्तलेखों का अवलोकन किया, तो अपने समय से बहुत आगे बढ़े हुए कवि देवीदास की रचनाओं को देख उसे हिन्दी जगत् के समक्ष विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत करना समुचित समझा। यह रचना राजस्थानी और ब्रज की भी उतनी ही अपनी लगती है जितनी परिनिष्ठित हिन्दी की।

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