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Rachna Aur Alochana Ki Dwandwatmakta

by Kamla Prasad
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170558125
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 227
  • Original Price: INR 225.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): General

रचना और आलोचना की द्वन्दात्मकता - कमला प्रसाद ने रचना तथा आलोचना के द्वन्द्वात्मक रिश्ते को सामाजिक सन्दर्भों में विश्लेषित किया है। कारण न तो रचना आसमान से आती है और न आलोचना की कसौटियों का निर्माण आसमान से होता है। सामाजिक जीवन से सामाजिक परिवर्तनों से दोनों को गति तथा ऊर्जा मिलती है और सामाजिक जीवन की इस ऊर्जा से वंचित होकर दोनों अपना ताप खो देते हैं समाज तथा साहित्य रूप का यह सम्बन्ध भी सरल नहीं होता वरन् जटिल तथा वक्र होता है। इस जटिलता तथा वक्रता को भी समझना ज़रूरी है अन्यथा रचना जीवन की पुनर्रचना का गौरव खोकर और आलोचना इस पुनर्रचना की वैज्ञानिक समझ का साक्ष्य न बनकर, हलकी और सतही इकाइयाँ बन जा सकती हैं। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि लेखक ने समाज तथा साहित्य के सम्बन्ध को समझने में यान्त्रिक तथा सरलीकरण की विधि से भरसक बचते हुए उसके वैज्ञानिक आधार के साथ समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। लेखक परिपक्व बुद्धि का स्वामी है और साहित्य तथा समाज दोनों की अन्तःक्रियाओं की साफ़ समझ भी उसके पास रही है। यही कारण है कि पहली बार एक बहुत विस्तृत तथा गम्भीर विषय पर एक सुलझा हुआ अध्ययन सामने आ सका है। यह अध्ययन इसलिए भी ज़रूरी था ताकि रचना और आलोचना को उस तनाव से, उस प्रतिद्वन्द्विता तथा प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके जो उनके रिश्तों की द्वन्द्वात्मक समझ के अभाव में रचना तथा आलोचना दोनों स्तरों पर एक अराजकता बनकर सामने आयी हैं। -शिवकुमार मिश्रकमला प्रसाद की इस पुस्तक में रचना और आलोचना के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों पर पहली बार वस्तुपरक ढंग से ब्यौरेवार विचार किया गया है। अपने आप में यह एक बहुत बड़ा विषय है और थोड़ा महत्त्वाकांक्षापूर्ण भी, पर यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि कमला प्रसाद ने विषय के इस विस्तार और जटिलता के बावजूद उसके विश्लेषण की जो पद्धति अपनायी है, वह वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत है। रचना और आलोचना के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध की व्याख्या के साथ उन्होंने उन ऐतिहासिक सन्दर्भों की भी व्याख्या की है, जिनसे ये उत्पन्न होती हैं और इस प्रकार यहाँ पहली बार पूरी समस्या का एक गम्भीर समाजशास्त्रीय विवेचन प्रस्तुत किया गया है।पुस्तक में एक ओर विषय के विभिन्न सैद्धान्तिक पहलुओं का विस्तृत विवेचन किया गया है और दूसरी ओर व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है। दोनों प्रकार के अध्ययनों में लेखक की दृष्टि गहरे अर्थ में शोधपरक है क्योंकि वह केवल व्याख्या ही नहीं करता नये तथ्यों के आलोक में अपनी स्थापनाओं की पड़ताल भी करता चलता है।पुस्तक में एक वैज्ञानिक दृष्टि के आधार पर आधुनिक हिन्दी कविता के विकास की दिशा को खोजने का भी प्रयास किया गया है और कमला प्रसाद का निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण है कि आलोचना केवल रचना की व्याख्या नहीं है, बल्कि वह गहरे अर्थ में सामाजिक गतिशीलता के उन नियमों की खोज है, जो रचना को संचालित और सम्बोधित करते हैं। -नामवर सिंह

कमला प्रसाद - जन्म : 14 फ़रवरी, 1938 को सतना ज़िले के गाँव धारहरा में । निधन : 25 मार्च, 2011। प्रकाशित कृतियाँ : साहित्यशास्त्र, छायावादोत्तर काव्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, छायावाद: प्रकृति और प्रयोग, दरअसल, रचना और आलोचना की द्वन्द्वात्मकता, समकालीन हिन्दी निबन्ध और निबन्धकार, कविता तीरे, साहित्य और विचारधारा, मध्ययुगीन रचना और मूल्य, यशपाल (मोनोग्राफ़), गिरा अनयन, सम्पादक की कलम, आलोचक और आलोचना।'पहल' पत्रिका से वर्षों जुड़े रहे और 'वसुधा' का भी सम्पादन किया। सम्मान : नन्ददुलारे वाजपेयी पुरस्कार-मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी, सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा, रामविलास शर्मा सम्मान, शमशेर सम्मान तथा अनेक संस्थानों के सम्मान।राजकुमार केसवानी जन्म : 26 नवम्बर 1950 को भोपाल में ।। 'पहला कविता संग्रह 'बाकी बचे जो' (2006), सातवाँ दरवाजा (2007), 13वीं शताब्दी के महान सूफ़ी। 'सन्त-कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी की फ़ारसी। 'कविताओं का हिन्दुस्तानी में अनुवाद 'जहान-ए-रूमी'।। संगीत और सिनेमा पर केन्द्रित पुस्तक 'बॉम्बे टॉकीज़' भी। प्रकाशित है। उपन्यास 'बाजे वाली गली' और। दास्तान-ए-मुग़ल-ए-आज़म' शीघ्र प्रकाश्य हैं। सम्प्रति : संयुक्त सम्पादक 'पहल'।

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