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Saire Jahan

by Shaharyaar
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789387330733
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 160
  • Original Price: INR 199.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Revised Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): General

शहरयार को पढ़ता हूँ तो रुकना बहुत पड़ता है... पर यह रुकावट नहीं, बात के पड़ाव हैं, जहां सोच को सुस्ताना पड़ता है- सोचने के लिए। चौंकाने वाली आतिशबाजी से दूर उनमें और उनकी शायरी में एक शब्द शइस्तगी है। शायद यही वजह है कि इस शायर के शब्दों में हमेशा कुछ सांस्कृतिक अक्स उभरते रहते हैं... सफ़र के उन पेड़ों की तरह नहीं जो झट से गुजर जाते हैं बल्कि उन पेड़ों के तरह जो दूर चलते हैं और देर तक सफ़र का साथ देते हैं। शहरयार की शायरी में एक अंदरूनी सन्नाटा है वह बिना कहे अपने वक्त के तमाम तरह के सन्नाटों से वाबस्ता हो जाता है... सोच में डूबे हुए यह सन्नाटे जब दिल की बेचैन बस्ती में गूंजते हैं तो कभी निहायत निजी बात कहते हैं, कभी इतिहास के पन्ने पलट देते हैं, कभी डायरी की इबारत बन जाते हैं। कभी उसी इबारत पर पड़े आंसूओं के छींटों से मिट गया या बदशक्ल हो गये अलफाज़ को नये अहसास के सांस से दुबारा ज़िंदा कर देते हैं... शायद इसलिए शहरयार की शायरी मुझे एकांति ख़लिश और शिकायती तेवर से अलग बड़ी गहरी सांस्कृतिक सोच की शायरी लगती है, जो दिलो-दिमाग की बंजर बनाती गयी ज़मीन को सींचती है। -कमलेश्वर

जन्म : 16 जून 1936 में आंवला जिला बरेली (उ.प्र.) में। शहरयार उर्दू के प्रतिष्ठित शायर हैं। उनका नाम हिन्दी पाठकों में भी आदर के साथ लिया जाता है। वाणी प्रकाशन ने इस काव्य संग्रह से पूर्व 'कहीं कुछ कम है' के नाम से उनका एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया था, जिसे हमारे हिन्दी पाठकों ने बहुत सराहा। पाठकों की रुचि को धयान में रखते हुए हम उनका दूसरा संग्रह प्रकाशित कर रहे हैं। इस संग्रह में शयार की अब तक की सभी नई और कुछ पुरानी रचनाएं प्रस्तुत की जा रही हैं। इस काव्य संग्रह में शामिल रचनाओं द्वारा हमें शहयार के बुनियादी सरोकारों से साक्षात्कार होता है। जिन बातों को हम वास्तविक और जिन चीजों को बहुमूल्य समझते हैं, शहरयार की शायरी उनका इन्कार करती है। उनकी पैनी दृष्टि पर्दे के पीछे के भयावह दृश्य को भी देख लेती है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इस संग्रह की शायरी मानवीय मूल्यों, सामाजिक संदर्भो और जीवन के प्रति अगाधा प्रेम की शायरी है। यह शायरी उपभोक्तावादी संस्कृति से होने वाले जीवन मूल्यों में निरन्तर हास की त्रासदी की शायरी है। हम आशा करते हैं कि शहरयार का यह काव्य संग्रह हमारे पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत सिद्ध होगा। उत्कृष्ट साहित्य सेवा पर साहित्य अकादमी पुरस्कार के अतिरिक्त उर्दू अकादमी लखनऊ से पुरस्कृत और भी अनेकों पुरस्कार। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय उर्दू विभाग के प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष पद से 1996 ई. में कार्यमुक्त हुए। फिलहाल जनवादी लेखक संघ की अलीगढ़ इकाई के अधयक्ष तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और शायर।

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