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Seppuku

by Vinod Bhardwaj
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350726006
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 104
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

सेप्पुकु - भारतीय कला की दुनिया में गरिमा, ग्लैमर, ग़रीबी, अश्लील अमीरी, संघर्ष, भ्रष्टाचार, ईमानदारी, धोखाधड़ी सभी कुछ लगभग अतियथार्थवादी शैली में मौजूद है। सुपरिचित कवि-लेखक, फ़िल्म और कला समीक्षक विनोद भारद्वाज पिछले चार दशकों से इस दुनिया के अन्तरंग गवाह और हिस्सेदार एक साथ हैं। पिछले कुछ सालों से वह इस दुनिया के पात्रों, घटनाओं, प्रसंगों आदि पर आधारित उपन्यास 'सेप्पुकु' लिख रहे थे। ग्यारह अध्यायों के इस लघु उपन्यास में कला की दुनिया का ‘अंडरग्राउंड' भी एक ख़ास तरह से मौजूद है। कला बाज़ार की अश्लील अमीरी ने उसे एक समय लगभग माफिया का रूप भी दे दिया था। इस दुनिया में एक ओर कलाकार का सच्चा, ईमानदार संघर्ष है और दूसरी ओर पैसे, सेक्स और भ्रष्टाचार का अद्वितीय घालमेल भी है। 'सेप्पुक' जापानी सामुराई योद्धा की त्रासद नियति है पर उसमें बाक़ायदा एक कर्मकांड, दर्शन, कविता भी छिपी हुई है। आधुनिक 'कार्पोरेट' दुनिया जब 'सेप्पुकु' (या खास तरह की आत्महत्या) करती है तो उसके कई बड़े सामाजिक-आर्थिक नतीजे सामने आते हैं। कला की दुनिया में भी इस तरह के 'सेप्पुकु' को पहचाना, जाना और जाँचा जा सकता है। विनोद भारद्वाज ने एक प्रयोगधर्मी तकनीक का इस्तेमाल करके विभिन्न पात्रों, घटनाओं, स्थितियों को एक-दूसरे से जोड़ा है। पिछले तीस सालों की कला दुनिया में कहानी किसी भी काल में आती-जाती रहती है। उपन्यास का अन्तिम अध्याय एक 'थ्रिलर' शैली में है।

विनोद भारद्वाज - 1948 में लखनऊ, उत्तर प्रदेश में जन्मे विनोद भारद्वाज ने लखनऊ विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एम.ए. करने के बाद 1973 से 1998 तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हिन्दी प्रकाशनों-धर्मयुग, दिनमान, नवभारत टाइम्स में 25 सालों तक पत्रकारिता करने के बाद स्वतन्त्र लेखन का रास्ता अपना लिया। 1967-69 में जब वह छात्र थे तो अपने समय की चर्चित कविता-कला की लघु पत्रिका ‘आरम्भ' का उन्होंने सम्पादन किया। 'दिनमान' में प्रतिष्ठित कवि पत्रकार रघुवीर सहाय ने उन्हें अपनी टीम में शामिल होने के लिए निजी बुलावा दिया जहाँ आधुनिक जीवन, आधुनिक विचार, सिनेमा, कला पर उन्होंने बरसों कॉलम लिखे। 1981 में विनोद भारद्वाज को सर्वश्रेष्ठ कविता का स्व. भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार (निर्णायक, विष्णु खरे) मिला और 1982 में उन्हें श्रेष्ठ सर्जनात्मक लेखन के लिए संस्कृति पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार की ज्यूरी के एक सदस्य प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह भी थे। 1989 में उन्हें लेनिनग्राद अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव की ज्यूरी में चुना गया। इन दिनों वह कला के क्यूरेटर और फ़िल्मकार के रूप में भी सक्रिय हैं। दो कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह (चितेरी) और दस से अधिक कला-सिनेमा की पुस्तकें प्रकाशित हैं। वाणी प्रकाशन से उनका 'बृहद् आधुनिक कला कोश' छपकर चर्चित हो चुका है।

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