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Tajmahal Ka Tender

by Ajay Shukla
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788126729128
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 80
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Ed.
  • Item Weight: 230 grams
  • BISAC Subject(s): General

‘ताजमहल का टेंडर’ हिन्दी का ऐसा मौलिक नाटक है जिसने सफल मंचनों के नए कीर्तिमान गढ़े। संस्कृत, अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं से अनूदित-रूपान्तरित नाटकों पर निर्भर रहनेवाले हिन्दी रंगमंच के पास हिन्दी के अपने मौलिक नाटक इतने कम हैं कि उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। उनमें भी मंचीयता के गुणों से सम्पन्न नाटक तो और भी कम हैं। ऐसे में ‘ताजमहल का टेंडर’ एक राहत की तरह मंच पर उतरा था और आज वह अनेक नाटक-मंडलियों की प्रिय नाट्य-कृतियों में है, दर्शकों को तो ख़ैर वह भुलाए ही नहीं भूलता। देश-विदेश की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद और मंचन हो चुका है, और हो रहा है।

नाटक का आधार यह परिकल्पना है कि मुग़ल बादशाह शाहजहाँ इतिहास से निकलकर अचानक बीसवीं सदी की दिल्ली में गद्दीनशीन हो जाते हैं, और अपनी बेगम की याद में ताजमहल बनवाने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं। नाटक में बादशाह के अलावा बाक़ी सब आज का है। सारी सरकारी मशीनरी, नौकरशाही, छुटभैये नेता, क़िस्म-क़िस्म के घूसख़ोर और एक-एक फ़ाइल को बरसों तक दाबे रखनेवाले अलग-अलग आकारों के क्लर्क, छोटे-बड़े अफ़सर, और एक गुप्ता जी जिनकी देखरेख में यह प्रोजेक्ट पूरा होना है। सारे ताम-झाम के साथ सारा अमला लगता है और देखते-देखते पच्चीस साल गुज़र जाते हैं। अधेड़ बादशाह बूढ़े होकर बिस्तर से लग जाते हैं और जिस दिन ताजमहल का टेंडर फ्लोट होने जा रहा है, दुनिया को विदा कह जाते हैं।

नाटक का व्यंग्य हमारे आज के तंत्र पर है। बीच-बीच में जब हम इसे बादशाह की निगाहों से, उनके अपने दौर की ऊँचाई से देखते हैं, वह और भी भयावह लगता है, और ताबड़तोड़ कहकहों के बीच भी हम उस अवसाद से अछूते नहीं रह पाते जिसे यह नाटक रेखांकित करना चाहता है—यानी स्वार्थ की व्यक्तिगत दीवालियों के बीच पसरा वह सार्वजनिक अन्धकार जिसे आज़ादी के बाद के भारत की नौकरशाही ने रचा है।

 

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