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Uttaradhikarini

by Manohar Shyam Joshi
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352290475
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 104
  • Original Price: INR 95.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): General

उत्तराधिकारिणी - अपने लेखन में निरन्तर प्रयोगधर्मी रहे मनोहर श्याम जोशी ने पुनर्रचना के रूप में एक नयी विधा का हिन्दी में सूत्रपात किया था। उस अर्थ में 'उत्तराधिकारिणी' का अपना ख़ास महत्त्व है। जो बात इसमें विशेष रूप से ध्यान रखने वाली है वह यह है कि बावजूद इसके कि इसे पुनर्रचना कहा गया है यह पूर्ण रूप से मौलिक उपन्यास है। 'वाशिंगटन स्क्वायर' की पुनर्रचना कहकर जोशी जी ने 19वीं शताब्दी के महान लेखक हेनरी जेम्स के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित की है।जोशी जी का यह उपन्यास उनके समस्त लेखन में एक भिन्न स्थान रखता है। इसमें उनकी वह शैली नहीं है जिसकी वजह से उनको हिन्दी में उत्तर-आधुनिक उपन्यास के जनक के रूप में देखा गया- अनेकान्तता या क़िस्सों के भीतर से निकलते हुए क़िस्से, भाषा का जबरदस्त खेल। लेकिन एक बात है इस उपन्यास में रोचकता भरपूर है। भाषा का वह बाँकपन भी है जो बाद में उनकी सिग्नेचर शैली मानी गयी।अन्तिम पृष्ठ आवरण - "डॉक्टर राज ने अपनी बेटी की 'मूर्ख भावुकता' को बीमारी का दर्जा दिया और बाक़ायदा जाँच-पड़ताल शुरू की। मनमथ नाम के जिस 'कीटाणु' के कारण यह बीमारी फैली थी उसके बाबत पूरी जानकारी हासिल करना ज़रूरी था। लेकिन पूछताछ करने पर महज़ इतना पता चल सका कि मनमथ बाबू के बारे में किसी को कुछ पता नहीं है। या यो कहिए कि वही पता है जो मनमथ बाबू ने ख़ुद बताया है। अलग-अलग लोगों से हीरो मनमथ के जीवन के नाटकीय उतार-चढ़ाव, काव्यात्मक धूप-छाँव के अलग-अलग क़िस्से सुनने को मिले और डॉक्टर साहेब इसी नतीजे पर पहुँचे कि 'एक लफंगे ने अपने हुस्न का सहारा लेकर मेरी अबोध बिटिया का मजाक उड़ाया है।' कसमियाँ तौर पर यही कहा जा सकता है कि मनमथ बाबू ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने बाप की जमापूँजी किसी 'बिजनेस' में गँवा दी और फिर घर से भाग खड़े हुए। कोई बारह वर्ष बाद लौटे हैं और अपनी ग़रीब विधवा बहन के घर में जमे हुए हैं। उन्हें किसी अच्छी 'बिजनेस' की तलाश है, मगर फिलहाल शायद डॉक्टर राज की अपार सम्पदा की उत्तराधिकारिणी कामिनी के प्रेमी और पति बन जाने की योजना में ही 'बिजी हैं"।

मनोहर श्याम जोशी - 9 अगस्त, 1938 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोज़ी-रोटी की ख़ातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोज़गारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21 वें वर्ष से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये।प्रेस, रेडियो, टी.वी., वृत्तचित्र, फ़िल्म, विज्ञापन-सम्प्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन कार्य न किया हो खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर उन्होंने क़लम न उठायी हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवायी जब सैंतालीस वर्ष के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविज़न धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्र लेखन करते रहे।निधन : 30 मार्च, 2006 ।

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