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Varun Ke Bete

by Nagarjun
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788170552048
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 120
  • Original Price: INR 125.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): Comics & Graphic Novels

हीरा जी मेडिकल कालेज (पटना) का छात्र था और अफ़वाह फैल रही थी कि उसका दिमाग फिर गया है। औज-मौज में हज़ार-पाँच सौ। रुपये फेंक-फूँक दे तो ठीक है। सौ-पचास लगाकर गाँधीजी और नेहरू जी की रजत-प्रतिमाएँ बनवा ले तो ठीक है। मगर कम्युनिस्टों की संगत में वक़्त गँवाये, छठे-छमाहे दस-पाँच रुपये उनकी पार्टी को चन्दा दे, स्टूडेंट फेडरेशन द्वारा चलाई गयी तहरीकों में दिलचस्पी ले, तो अवश्य ही उसका मस्तिष्क विकृत हो गया है... अभिजातवर्गीय आलोचना का कुछ ऐसा ही रुख था हीरा जी के बारे में। लेकिन मोहन माँझी तो बिल्कुल दंग रह गया था उसकी भावुकता देखकर! साइकिल नयी नहीं थी, दो-तीन साल पुरानी थी। मगर इससे क्या? एक श्रद्धालु की तरफ़ से अर्पित नैवेद्य तो थी वह ! माँझी जनसामान्य की आस्था का अद्भुत पारखी था। उसे लगा कि 'ना' कर देने पर हीरा जी को हफ्तों नींद। नहीं आयेगी; यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। 'कि दादा-परदादा और बाप-चाचा जालिम ज़मींदार रहे हैं तो यह भी उन्हीं का अनुगमन करेगा। / "देखो मंगल, अब हम छोकरा-छोकरी नहीं रहे! धूल-मिट्टी के बचकाने खेल काफ़ी खेल चुके। सयाने समझकर माँ-बाप और सास-ससुर ने तुम पर जो ज़िम्मेदारी सौंपी है उससे जी चुराना कायरता होगी। तुम्हें अपनी घरवाली के प्रति वफ़ादार होना है, मुझे अपने घरवाले के प्रति । गाँव-गँवई के हम सीधे-सादे लोग ठहरे। हमारा प्रेमनगर कहीं समाज से अलग या संसार के बाहर आबाद हुआ है? सुनती हूँ, बड़े आदमी जब और कामों से ऊब उठते हैं तो दिल के टुकड़े इधर-उधर फेंका करते हैं और दसियों घर बर्बाद कर छोड़ते हैं। मैं तुम्हारा घर बर्बाद नहीं करना चाहती मंगल, मैं नहीं चाहती कि एक औरत की सिन्दूरी माँग पर कालिख पोतती रहूँ।.."

नागार्जुन -प्रख्यात कवि-कथाकार के रूप में चर्चित नागार्जुन का पूरा नाम श्री वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री', ‘नागार्जुन’ है। 1911 की ज्येष्ठ पूर्णिमा को जन्मे नागार्जुन का मूल निवास स्थान तरौनी, जिला दरभंगा (बिहार) है। अनेक उपन्यास हिन्दी और मैथिली की 'क्लासिक' परम्परा में आ चुके हैं। कई काव्य-संग्रह प्रगतिशील साहित्य के आधार स्तम्भ हैं।मैथिली काव्य-संग्रह पत्रहीन नग्न गाछ को 1968 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है। प्रकाशित कृतियाँ : युगधारा, सतरंगे पंखोंवाली, प्यासी पथराई आँखें, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, हज़ार-हज़ार बाँहों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस, रत्नगर्भ, ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने (हिन्दी कविता-संग्रह); चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ (मैथिली कविता-संग्रह); भस्मांकुर ( हिन्दी खण्ड काव्य); रतिनाथ की चाची, बलचनमा, नई पौध, बाबा बटेसरनाथ, वरुण के बेटे, दुखमोचन, कुम्भीपाक, अभिनन्दन, उग्रतारा, इमरतिया, पारो (हिन्दी उपन्यास); पारो, बलचनमा, नव-तुरिया (मैथिली उपन्यास); एक व्यक्ति एक युग निराला (समीक्षात्मक जीवनी); मर्यादा पुरुषोत्तम (जीवनी); बमभोलेनाथ, अन्नहीनम् क्रियाहीनम् (स्फुट निबन्ध-संग्रह); आसमान में चन्दा तैर (कहानी-संग्रह); गीत गोविन्द, मेघदूत, विद्यापति के गीत, विद्यापति की कहानियाँ (अनुवाद) ।निधन : 5 नवम्बर 1998 ।

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