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Yadon Ka Shantiniketan

by Manorama Bishwal Mohapatra
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789352295883
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 64
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

कविता से हम बराबर यह उम्मीद करते हैं कि वह हमारे जीवन को उसकी सारी रंगतों, छवियों, विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों में विन्यस्त करे। हम जानते हैं कि कविता से जीवन हमेशा बड़ा है : कविता उसे कभी पूरी तरह से समो नहीं सकती। फिर भी, हम कविता से उम्मीद करते हैं कि वह ऐसा करने का असम्भव उद्यम करे। जब कोई नया या अतिथि कवि हमारे सामने आता है तो हमारी उत्सुकता होती है यह जानने की कि उसने अपनी कविता में किस तरह का जीवन खोजा-पाया, बसाया रचा है।श्रीमती मनोरमा विश्वाल महापात्र की कविता का पहला आकर्षण यही है कि उनकी आधुनिकता ने अपने मूल अंचल की स्थानीयता, स्मृतियों और ऐन्द्रिकता को न सिर्फ़ सहेजा है, बल्कि जीवन को देखने और बखान करने का उपकरण बनाया है। उनके यहाँ निविड़ता में 'खुले आकाश का गीत ' सुना जाता है और बस एक करुण सूर्यास्त थिरक जाता है/घर के नक्शे पर। वे उस गाँव-घर को बार-बार कविता में याद करती और सजीव करती हैं, जिसकी ज़िन्दगी भरपूर मधुछत्ते की तरह थी। सौभाग्य से उनमें शून्यता का साक्षात् करने और मृत नदी के तट पर जाने का साहस भी है। उनकी स्मृतियाँ निजी नहीं पौराणिक और ऐतिहासिक भी हैं।इस हिन्दी अनुवाद से मनोरमा जी का हिन्दी में काव्य- प्रदेश स्वागत के योग्य है। इस सच्चाई का एक बार फिर इज़हार है कि हम भारतीय जीवन की जटिल सूक्ष्मताएँ और अपार विस्तार दोनों ही आज की कविता में पहचान सकते हैं और कविता हमारे समय में सारी आपाधापी के बावजूद जिजीविषा की एक स्पन्दित विधा है।—अशोक वाजपेयी★★★सप्तपर्णी केवल शान्तिनिकेतन ही में खिलता है। सुनहरे फूलों से जब मण्डित हो जाता है शान्तिनिकेतन।बचपन, बचपन की भाँति महकने लगता है। संगोष्ठी, कविता-उत्सवसब आज के उपलक्ष्य मेंअतीत के छात्रावास केझरोखे के पासटगर, तराट फूल के वृक्षों की छाया सब कुछ पा लिया है की भावना का देश है शान्तिनिकेतन।सप्तपर्णी फूल बस शान्तिनिकेतन ही में खिलता है।उस दिन मयूराक्षी के जल-भँवर मेंखो गये समय केसभी अच्छे दिनमैं एक पत्र के समानबह चली दूर से दूरतर।(इसी पुस्तक से)

मनोरमा विश्वाल महापात्रजन्म : 27 नवम्बर 1948, जगाई, बालासोर, ओडिशा।ओडिशा की प्रमुख रचनाकारों में प्रो. डॉ. मनोरमा विस्वाल महापात्र का एक सम्मानजनक स्थान है। विश्वभारती विश्वविद्यालय, शान्तिनिकेतन से शिक्षित बहुसर्जक लेखिका डॉ. मनोरमा अपने रचनात्मक करियर में चार दशकों से अधिक समय से सक्रीय हैं। इनकी कविताओं की तीस और बाल-साहित्य की चालीस पुस्तकें प्रकाशित हैं। इसके अलावा इनकी कई शैक्षणिक पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। ये उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, ओडिशा में ओड़िया भाषा और साहित्य की पूर्व प्रोफ़ेसर रही हैं। ये केन्द्रीय और राज्य साहित्य अकादमी सहित कई प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों की सदस्य हैं। इन्हें अपने कविता-संग्रह ‘फाल्गुनी तिथिरा झिया’ (वसन्त की कन्या) के लिए राज्य साहित्य अकादमी द्वारा कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। ग्रीस में विश्व कवि सम्मेलन और लन्दन, स्वीडन, न्यूयॉर्क, मॉरीशस, बांग्लादेश, नेपाल आदि दे शों में इन्हें अन्तरराष्ट्रीय साहित्यिक संगोष्ठियों में भाग लेने का सम्मान प्राप्त हुआ है।डॉ. मनोरमा की कविता-पुस्तकों का अनुवाद अंग्रेजी, हिन्दी, बांग्ला, असमिया, उर्दू, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, पंजाबी, फ्रेंच, मैथिली, मराठी आदि भाषाओं में किया गया है। इनके बाल-साहित्य की कई पुस्तकों का भी अंग्रेज़ी, हिन्दी, बांग्ला, तेलुगु, पंजाबी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है और इससे इन्हें काफ़ी ख्याति मिली है। 2013 में अमृतसर में पंजाब कला साहित्य अकादमी द्वारा बाल-साहित्य के क्षेत्र में इनके जीवन भर के योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इन्हें बच्चों के साहित्यिक कार्यों के लिए 'विश्वजीत पुरस्कार' और 'सिसु साहित्य पुरस्कार' भी प्राप्त हुए हैं। ये ज्ञानपीठ की भी सदस्य रही हैं।प्रो. महापात्र उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, विश्वभारती विश्वविद्यालय, शान्तिनिकेतन, पश्चिम बंगाल और यूजीसी तथा यूपीएससी, नयी दिल्ली के शैक्षिक निकायों के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं।साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त करने वाली प्रो. महापात्र को भारत सरकार द्वारा वरिष्ठ फ़ेलोशिप भी प्राप्त है। इनके कई गीतों को टी-सीरीज़ द्वारा उत्कृष्ट ऑडियो-विजुअल सीडी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

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