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Pachas Kavitayen Nai Sadi Ke Liye Chayan: Mahadevi Verma

by Mahadevi Verma
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789350008973
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 96
  • Original Price: INR 96.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): General

महादेवी वर्मा का सबसे बड़ा अवदान तो यही है कि 'डिग्निफायड सफरिंग' के विक्टोरियन आदर्श की काट उन्होंने 'सविनय अवज्ञा' में ढूँढ़ी। अवज्ञा मगर सविनय । उनकी भाषा सविनय अवज्ञा की मर्यादित और प्रतीककीलित भाषा है; उसमें एक शालीन-सा रोबदाब और प्रज्ञापूर्ण सन्तुलन है : ‘अप्प दीपो भव' वाला ।स्वाभिमान से महमह जीवन उन्होंने जिया आधुनिक स्त्री की तरह - पढ़ते-पढ़ाते वंचितों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों का एक महापरिवार, एक कम्यून गठित करके ! किसी ध्रुपद के आलाप में जैसे बार-बार कुछ बीज-शब्द आते हैं, इनके गीतों में भी विरह की आलापचारी आती है ! पर इस विरह को एक रूपक; 'ठकुरी बाबा' की बटुली की तरह पढ़ा जा सकता है, बटुली, जिसमें कुछ भी बँधा हो सकता है, किसी भी तरह का समसामयिक अभाव ! विरह या वियोग देशकाल की आदर्श स्थिति या स्वाधीनता का भी हो सकता है।पुरुष की छाया वाली रूढ़ि जीवन में तो महादेवी ने तोड़ी, कविताओं में अवश्य 'चेतन' से अधिक 'अवचेतन' का, 'यथार्थ' से अधिक 'आदर्श' का दबाव इन पर बना हुआ है, पर उस घटाटोप में भी बिजलियाँ चमकती हैं । 'क्या पूजा क्या अर्चक रे' कहते हुए कर्मकाण्ड को धता बताती महादेवी आजादी के बाद के एक खिन्न गीत में कहती हैं :'यह विरह की रात का कैसा सवेरा है, पंक-सा रथचक्र में लिपटा अँधेरा है।'सन्दर्भ से स्पष्ट है कि विरह स्वाधीनता का था, प्रतीक्षा उसी की थी । स्वाधीनता आयी, विरह की रात कटी, सवेरा हुआ मगर विभाजन और आत्मविभाजन की त्रासदियों से विदीर्ण! विजयरथ का पहिया रक्तकीच से सना होने का कोई गैर-राजनीतिक भाष्य भला क्या होगा ! जिस दाग़- दाग़ अँधेरे की बात महादेवी यहाँ करती हैं, उसे पढ़कर फ़ैज़ की ये पंक्तियाँ एकदम से याद आ जाती हैं :‘ये दाग़-दाग़ उजाला, वो शब गुजीदा सहर । कि इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं।'

"महादेवी वर्मा - जन्म : 26 मार्च 1907 - निधन : 11 सितम्बर, 1987।महादेवी वर्मा की गणना छायावाद के महान कवि-व्यक्तित्वों में प्रसाद, पन्त और निराला के ठीक बाद होती है। महादेवी जी का महत्त्व इसलिए भी है कि उन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता में नारी की अन्तर्वेदना को समाजी-स्वर अभिव्यक्ति दी और उदात्तता से जोड़ा। कविता के साथ-साथ महादेवी वर्मा का गद्य भी बीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य में अपनी अलग पहचान रखता है। नारी की स्वतन्त्र इयत्ता और मानवेतर जीव-जन्तुओं के प्रति वत्सल भावों की स्मरणीय अभिव्यक्ति उनके गद्य में हुई है।प्रमुख कृतियाँ (कविता संग्रह) दीपशिखा, नीरजा, रश्मि, सांध्य गीत, यामा, (रेखाचित्र व संस्मरण) अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, मेरा परिवार आदि।(स्त्री विमर्श) श्रृंखला की कड़ियाँ। "

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