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Pant, Prasad Aur Maithilisharan

by Ramdhari Singh 'Dinkar'
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788180313189
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: LokBharti Prakashan
  • Publisher Imprint: LokBharti Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 167
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 25 grams
  • BISAC Subject(s): General

प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी के तीन सुप्रसिद्ध आधुनिक कवियों पर स्वतंत्र रूप से अलग- अलग तीन निबन्ध संग्रहीत किये गये हैं । मैथिलीशरण गुज की कविताओं का अध्ययन इस दृष्टि से किया गया है कि उन्नीसवीं सदी में आरम्भ होने वाले हिन्दू जागरण अथवा भारतीय पुनरुत्थान की अभिव्यक्ति उनमें कैसे और किस गहराई तक हुयी है । पंत साहित्य में पल्लव, वीणा, गुंजन और ग्रंथि को जो प्रसिद्धि मिली, वह पंत जी की बाद की पुस्तकों को नसीब न हुयी । इस निबन्ध में दिनकर जी का ध्येय इस बात का अनुसंधान रहा है कि गुंजन के बाद से लेकर अब तक पंत जी क्या करते रहे हैं । इस निबन्ध ने गुंजनोत्तर पंत साहित्य की एक छोटी सी पीठिका तैयार कर दी है । प्रसाद जी पर जो निबन्ध हैं उसमें केवल कामायनी का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है । कामायनी के सुगंभीर ग्रंथ के अध्ययन के क्रम में होंगे और विद्वानों के विचारों को ऊँचे धरातल पर विचरण करने का अवसर प्राप्त होता है । दिनकर जी का प्रयास इस काव्य के अध्ययन- क्षितिज को विस्तृत बनाना रहा है ।

रामधारी सिंह 'दिनकर' (२३ सितंबर १९०८- २४ अप्रैल १९७४) हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। बिहार प्रान्त के बेगुसराय जिले का सिमरिया घाट उनकी जन्मस्थली है। उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। 'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है। उर्वशी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार जबकि कुरुक्षेत्र को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ काव्यों में ७४वाँ स्थान दिया गया।

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