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Rakta Kalyan

by Girish Karnad , Tr. Ramgopal Bajaj
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788199312210
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Radhakrishna Prakasan Pvt Ltd
  • Publisher Imprint: Radhakrishna Prakasan Pvt Ltd
  • Publication Date:
  • Pages: 124
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

सुविख्यात रंगकर्मी और कन्नड़ लेखक गिरीश कारनाड की यह नाट्यकृति एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। बसवण्णा नाम का एक कवि और समाज-सुधारक इसका केन्द्रीय चरित्र है। ईस्वी सन् 1106-1168 के बीच मौजूद बसवण्णा को एक अल्पजीवी ‘वीरशैव सम्प्रदाय' का जनक माना जाता है। लेकिन बसवण्णा के जीवन-मूल्यों, कार्यों और उसके द्वारा रचित पदों की जितनी प्रासंगिकता तब रही होगी, उससे कम आज भी नहीं है, बल्कि अधिक है; और इसी से गिरीश कारनाड जैसे सजग लेखक की इतिहास-दृष्टि और उनके लेखन के महत्त्व को समझा जा सकता है। बसवण्णा के जीवन-मूल्य हैं—सामाजिक असमानता का विरोध, धर्म-जाति, लिंग-भेद आदि से जुड़ी रूढ़ियों का त्याग, और ईश्वर-भक्ति के रूप में अपने-अपने ‘कायक’ यानी कर्म का निर्वाह। आकस्मिक नहीं कि उसके जीवनादर्शों में यदि गीता के कर्मवाद की अनुगूँज है तो परवर्ती कबीर भी सुनाई पड़ते हैं। लेकिन राजा का भंडारी और उसके निकट होने के बावजूद रूढ़िवादी ब्राह्मणों अथवा वर्णाश्रम धर्म के पक्ष में खड़ी राजसत्ता की भयावह हिंसा से अपने ‘शरणाओं’ की रक्षा वह नहीं कर पाता और न उन्हें प्रतिहिंसा से ही रोक पाता है। लेखक के इस समूचे घटनाक्रम को—बसवण्णा के जीवन से जुड़े तमाम अत्कर्य लोकविश्वासों को झटकते हुए एक सांस्कृतिक जनान्दोलन की तरह रचा है। विचार के साथ-साथ एक गहरी संवेदनशील छुअन और अनेक दृश्यबन्धों में समायोजित सुगठित नाट्यशिल्प। ज़ाहिर है कि इस सबका श्रेय जितना लेखक को है, उतना ही अनुवादक को है। अतीत के कुहासे से वर्तमान की तर्कसंगत तलाश और उसकी एक नई भाषिक सर्जना—हिन्दी रंगमंच के लिए ये दोनों ही चीज़ें समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।

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