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Sab Kuchh Hona Bacha Rahega

by Vinod Kumar Shukla
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789392757013
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 128
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 4th Edition
  • Item Weight: 15 grams
  • BISAC Subject(s): General

इस कविता-संग्रह में वह दृष्टि है जो समय को झरती हुई पत्तियों की जगह फूटती हुई कोंपलों में देखने का हौसला रखती है। विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ शब्दों को ध्वजा की तरह फहरानेवाली कविताएँ नहीं हैं। अनुभवों को हमारे पास छोड़कर स्वयं अदृश्य हो जानेवाली या अपने अद्भुत वाक्य-विन्यास की मौलिकता से स्वयं का दर्ज़ा प्राप्त कर लेनेवाली भाषा इन कविताओं की विशेषता है।... मंगल ग्रह सूना है। पृथ्वी के पड़ोस में सन्नाटा है। संकट में पृथ्वी के लोग कहाँ जाएँगे, कहकर उनकी कविताएँ हमारी संवेदना को जिन महत्तम आयामों से जोड़ती हैं, वह समकालीन कविता के लिए अभूतपूर्व है। जिस भाषा को राजनीतिज्ञों ने झूठा और कवियों ने अर्थहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, उसी से विनोद कुमार शुक्ल सच्चाई और जीवन में शेष हो चली आस्था की पुनर्रचना कैसे कर लेते हैं, यह एक सुखद आश्चर्य का विषय है। इसमें बच्चे हैं मज़दूरनियों के, जो दूध से पहले माँ के स्तनों पर आए पसीने का स्वाद चखते हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तयह कविता की दुर्लभ प्रजाति है जिसमें ऊबा हुआ पाठक ताज़गी से भरी कुछ गहरी साँसें ले सकता है।...इस पत्थर समय को मोम की तरह तराशते चले जाने की ताक़त और निस्संगता के स्रोत विनोद कुमार शुक्ल की ग़ैर-साहित्यिक पृष्ठभूमि और रुझानों में हैं। यह उनकी वैज्ञानिक समझ और संवेदना का दुर्लभ संयोग है और गहरी जीवनासक्ति कि पेड़, पत्थर, पानी, हवा हमें अपने पूर्वजों की तरह लगने लगते हैं (जो कि वे सचमुच हैं)।...एक अद्भुत आत्मीय संस्पर्श है इस दृष्टि में कि जिन चीज़ों पर वह पड़ती है, वे जीवित हो उठती हैं और अपने अधिकारों की माँग करने लगती हैं। इस तरह संग्रह की सम्पूर्णता में देखा जाए तो यही लगता है कि लाशों से भरे समय का सामना करती ये कविताएँ मृत्यु को न सिर्फ़ मनुष्य की नियति मानने से इनकार करती हैं बल्कि जीने के लिए ज़रूरी सामान भी जुटाती हैं। —नरेश सक्सेना

विनोद कुमार शुक्ल जन्म : 1 जनवरी, 1937 को राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) में। प्रमुख कृतियाँ : पहला कविता-संग्रह 1971 में ‘लगभग जयहिन्द’ (‘पहल’ सीरीज़ के अन्तर्गत), ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह’ (1981), ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ (1992), ‘अतिरिक्त नहीं’ (2000), ‘कविता से लम्बी कविता’ (2001), ‘कभी के बाद अभी’ (सभी कविता-संग्रह); 1988 में ‘पेड़ पर कमरा’ (‘पूर्वग्रह’ सीरीज़ के अन्तर्गत) तथा 1996 में ‘महाविद्यालय’ (कहानी-संग्रह); ‘नौकर की कमीज़’ (1979), ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ (सभी उपन्यास)। मेरियोला आफ्रीदी द्वारा इतालवी में अनुवादित एक कविता-पुस्तक का इटली में प्रकाशन, इतालवी में ही पेड़ पर कमरा का भी अनुवाद। इसके अलावा कुछ रचनाओं का मराठी, मलयालम, अंग्रेज़ी तथा जर्मन भाषाओं में अनुवाद। मणि कौल द्वारा 1999 में ‘नौकर की कमीज़’ पर फ़िल्म का निर्माण। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ पर फ़िल्म-निर्माण का कार्य अधूरा। ‘आदमी की औरत’ और ‘पेड़ पर कमरा’ सहित कुछ कहानियों पर बनी फ़िल्म ‘आदमी की औरत’ (निर्देशक—अमित) को वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल के 66वें समारोह 2009 में ‘स्पेशल इवेंट पुरस्कार’। दो वर्ष के लिए निराला सृजनपीठ में अतिथि साहित्यकार रहे (1994-1996)। सम्मान : ‘गजानन माधव मुक्तिबोध फ़ेलोशिप’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान’, ‘रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ पर ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ आदि। इन्दिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में कृषि-विस्तार के सह-प्राध्यापक पद से 1996 में सेवानिवृत्त, अब स्वतंत्र लेखन।

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