Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Adikaleen Hindi Sahitya Adhyayan Kee Dishayen

by Ed. by Anil Ray
Save 35% Save 35%
Current price ₹582.00
Original price ₹895.00
Original price ₹895.00
Original price ₹895.00
(-35%)
₹582.00
Current price ₹582.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789357754842
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 310
  • Original Price: INR 895.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 450 grams
  • BISAC Subject(s): General

आदिकालीन हिन्दी भाषा और साहित्य प्राकृत और अपभ्रंश से कई स्तरों पर घनिष्ट रूप से जुड़ा हुआ है। जुड़ाव या सम्बन्ध का यह बिन्दु अब भी पर्याप्त समस्यात्मक बना हुआ है। इस सन्दर्भ में पहले जो अध्ययन हुए हैं, उनके प्रति भी हिन्दी क्षेत्र में एक उदासीन मनोवृत्ति पसरी हुई लगती है। कई बार तो पुरानी चीज़ों को 'फिर से' जान लेना भी नया होना होता है। 'फिर से' जान लेना सिर्फ़ तथ्यों को जान लेना नहीं है बल्कि उन तथ्यों को बाह्य और आन्तरिक प्रसंगों और पहलुओं के साथ 'समस्या' बनने की प्रक्रिया के रूप में जानना है। मसलन अधिकांश आदिकालीन साहित्य में मनोद्वेगों, तीव्र और तात्कालिक उत्तेजनाओं की भूमिका अधिक है। भावनाएँ और प्रेरणाएँ विरल हैं। ऐसा क्यों है? उसमें भाषा, धर्म, अध्यात्म, दर्शन, समाज और राज्य की क्या भूमिका है? क्या है जो टूटा हुआ और अनुपस्थित-सा है? और जिसक़ी 'रिकवरी' भक्ति साहित्य में होती है?अनुभव की इस 'रिकवरी' का स्वरूप क्या है? इसका एक अर्थ यह भी होगा कि भक्ति साहित्य को आदिकालीन साहित्य के प्रसंग में पढ़ा जाना ज़रूरी लग सकता है-सिर्फ़ ऐतिहासिक क्रम के लिए नहीं, अनुभूति और अभिव्यक्ति की साहित्यिक संरचनाओं के लिए भी। यह समस्या-क्षेत्र पर्याप्त चुनौती-भरा है।डॉ. अनिल राय ने आदिकालीन भाषा और साहित्य पर हुए अध्ययनों में से उसी सामग्री का चयन किया है जो किसी न किसी 'समस्या-क्षेत्र' का उद्घाटन करती है। यह सम्पादित पुस्तक डॉ. राय के परिश्रम और वैदुष्य का ही नहीं आदिकालीन साहित्य को 'फिर से' पढ़ने की उनकी अन्तर्दृष्टि का भी प्रमाण प्रस्तुत करती है।निश्चय ही यह किताब आदिकालीन साहित्य के अध्ययन की नयी दिशाओं को खोलने में 'कैटेलेटिक एजेंट' का काम करेगी ।- नित्यानन्द तिवारी

अनिल राय -जन्म : उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले में।शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए., एम. फ़िल., पीएच.डी. ।ढाई वर्ष तक दक्षिण एशिया अध्ययन विभाग, पीकिंग विश्वविद्यालय, बीजिंग (चीन) में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे ।दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज और शहीद सुखदेव कॉलेज ऑफ़ बिज़नेस स्टडीज़ की गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन रहे। हंसराज कॉलेज, दौलतराम कॉलेज, देशबन्धु कॉलेज, गुरु गोविंद सिंह कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स (दिल्ली विश्वविद्यालय) की गवर्निंग बॉडी के सदस्य । भारत के कई केन्द्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों के अध्ययन मण्डल (बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़) के सदस्य। राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय के विद्वत परिषद् के सदस्य । हिन्दुस्तानी एकेडेमी, प्रयाग, (उत्तर प्रदेश सरकार) से 4 लाख रुपये का 'सन्त कबीर सम्मान' प्राप्त, 'अवध संस्कृति सम्मान' (गोंडा, उत्तर प्रदेश) से भी सम्मानित ।निर्गुण काव्य में नारी, आदिकालीन हिन्दी साहित्य : अध्ययन की दिशाएँ, निबन्धों की दुनिया : शिवपूजन सहाय, चीनी लोक कथाएँ, माओ के देश में, स्त्री के हक़ में कबीर, पाश्चात्य काव्यशास्त्र : कुछ सिद्धान्त कुछ वाद इत्यादि पुस्तकों के साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शोध-लेख, समीक्षाएँ, कहानियाँ और कविताएँ प्रकाशित ।सम्प्रति : डीन, अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध (मानविकी एवं समाजविज्ञान) एवं वरिष्ठ प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-110007ई-मेल : anilrai1963@gmail.com, akrai@hindi-du-ac-in

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us