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Alakh Azadi Ki

by Sushil Kumar Singh
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788170556329
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 88
  • Original Price: INR 75.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 4th Edition
  • Item Weight: 100 grams
  • BISAC Subject(s): General

अलख आज़ादी की - सोने की चिड़िया है भारत,क़िस्सा ये मशहूर है। सारी दुनिया के पर जैसे ये सिन्दूर थाप्राचीन काल से ही भारत अपने ज्ञान अध्यात्म धन-वैभव दिया, कला, कौशल में अद्वितीय रहा। सैकड़ों- हज़ारों वर्षों तक न केवल यूरोप बल्कि संसार की सभी मंडियों और बाज़ारों में भारत का ही माल आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था, यह सम्पन्नता ही विदेशी हमलावरों की यहाँ बार बार हमला करने के लिए प्रेरित करती रही। अधिकतर हमलावर या तो लूट-पाट करके वापस लौट गये या यहीं की संस्कृति में रच-बस गये किन्तु योरोपियस का चरित्र कुछ दूसरे ही किस्म का था। वे यहाँ व्यापारी बनकर आये और फिर राज सत्ता हथियाने के षड़यन्त्रों में लग गये....पहले व्यापार की अनुमति, फिर कोठी..कोठी से किला फ़ौजें और कबजा, डच, पूर्तगाली, फ्रांसीसी सभी का उद्देश्य यही था लेकिन अंग्रेज़ सबके उस्ताद निकले। सोलहवीं सदी की शुरुआत के साथ हिन्दुस्तान के साथ तिजारत बढ़ जाने के कारण पूर्तगाल की राजधानी लीबस्न का महत्व और उसकी शान योरोप में दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी। इंगलिस्तान के रहनेवालों को इससे ईर्ष्या होना स्वाभाविक था ।इंगलिस्तान में भी उस समय ब्रिस्टल का बन्दरगाह तिजारत का बड़ा केन्द्र था। यह अलग बात है कि ब्रिस्टल के नाविक अनेक पुस्तों से बड़े मशहूर समुद्री डाकू गिने जाते थे। उन दिनों योरोपियन कौम के लोग एक-दूसरे के माल से लदे जहाज़ों को लूट लेना जायज़ व्यापार समझते थे। इसी लूटपाट के ज़रिये अंग्रेज़ों को भारत के उस समय के जल मार्ग का पता चला था।सुशील कुमार सिंह का नवीनतम नाटक 'अलख आज़ादी की' मात्र एक रंगमंचीय नाटक ही नहीं है बल्कि यह हिन्दुस्तान के विगत चार सौ सालों का बेबाक लेखा-जोखा भी है।अलख आज़ादी की : रंगमंच के माध्यम से इतिहास सन् 1608 में पहला अंग्रेज़ी जहाज़, हिन्दुस्तान पहुँचा। इस जहाज़ का नाम 'हेक्टर' था। 'हेक्टर' प्राचीन यूनान के एक योद्धा का नाम था, जिसका अंग्रेज़ी में अर्थ है 'अकड़बाज' या 'झगड़ालू' ।....जहाज़ का कप्तान हाकिन्स पहला अंग्रेज़ था जिसने समुद्र के रास्ते आकर भारत की भूमि पर क़दम रखा था। ...जहाज़ सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा उस समय भारतीय व्यापार का एक प्रमुख केन्द्र था।यही वह समय था जब भारत में मुग़ल सम्राट जहाँगीर का शासन था; कप्तान हाकिन्स ने आगरा में मुगल सम्राट से भेंट की।जहाँगीर ने अंग्रेज़ों को न केवल व्यापार करने, कोठियाँ बनाने और मुग़ल दरबार में 'एलची' रखने की इजाज़त दी बल्कि यह भी इजाज़त दी कि वह अपनी बस्तियों में अपने क़ानून के मुताबिक अपने मुलाज़िमों को सज़ा भी दे सकते हैं।...इस छोटी-सी घटना और बाद में सन् 1857 की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ इतिहास लेखक 'टाटेन्स' अपनी पुस्तक 'इम्पायर इन एशिया में लिखता है "बादशाह न्यायशील और बुद्धिमान था। उसने उनकी आवश्यकताओं को समझते हुए जो उन्होंने माँगा उसने मंजूर कर लिया। उसे यह स्वप्न में भी नज़र नहीं आ सकता था कि एक दिन अंग्रेज़ इस छोटी सी जड़ से बढ़ते-बढ़ते बादशाह की प्रजा और उसके उत्तराधिकारियों तक को दण्ड देने का दावा करने लगेंगे...और यदि उनका विरोध किया जायेगा तो प्रजा का संहार कर डालेंगे तथा बादशाह के उत्तराधिकारी को बागी कह कर आजीवन क़ैद कर लेंगे।" रंगमंच के माध्यम से इतिहास को एक अलग दृष्टि से जानने-समझने अनूठा प्रयोग भी है 'अलख आज़ादी की'।

सुशील कुमार सिंह - रंगमंच और दूरदर्शन का एक जाना-माना नाम है, सुशील कुमार सिंह। 'सिंहासन खाली है' जैसे ख्याति प्राप्त नाटक के लेखक और 'बीबी नातियों वाली' जैसे मील के पत्थर दूरदर्शन धारावाहिक के निर्माता-निर्देशक सुशील कुमार सिंह ने कानपुर विश्वविद्यालय से बी.एससी. तक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नयी दिल्ली से नाट्य निर्देशन तथा भारतीय फ़िल्म एवं टी.वी. संस्थान, पूना से फ़िल्म एवं टी.वी. कार्यक्रम निर्माण एवं निर्देशन का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया।देश के विभिन्न भागों में पचास से अधिक रंगनाटकों का निर्देशन, लगभग पच्चीस नाट्य-शिविरों का संचालन, निर्देशन, अनेक टी.वी. धारावाहिकों, सौ से अधिक टी.वी. नाटक, टेलीफ़िल्मों, वृत्तचित्रों आदि का निर्माण निर्देशन।सुशील कुमार सिंह के चर्चित पूर्णकालिक नाटक हैं- 'सिंहासन खाली है', 'नागपाश', 'गुडबाई स्वामी', 'चार यारों की यार', 'अँधेरे के राही', 'बापू की हत्या हज़ारवीं बार', 'आज नहीं तो कल', 'आचार्य रामानुज', 'बेबी तुम नादान' । बाल नाट्य लेखन में भी सुशील जी पीछे नहीं हैं 'ठग ठगे गये', 'लोककथा कनुए नाई की', 'सुबह गई है आय', 'वैसे तो सब खैर कुशल है', सहित लगभग एक दर्जन बाल नाटक लिखे हैं। ये सभी नाटक प्रकाशित हैं। इनमें से कई नाटकों के अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं और अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किये गये हैं। अकेले 'सिंहासन खाली है' का पूरे भारतवर्ष में पाँच हज़ार से अधिक बार मंचन एवं लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। सन् 1991 में नाट्य-लेखन के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा श्री सुशील कुमार सिंह को सम्मानित एवं पुरस्कृत किया गया। 'अलख आज़ादी की' नाटक सुशील जी ने आज़ादी की पचासवीं वर्षगाँठ के अवसर पर विशेष रूप से भारतेन्दु नाट्य अकादमी रंगमंडल के आग्रह पर लिखा। जिसका मंचन भी पहली बार रंगमंडल ही कर रहा है।

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