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Azadi Ke Baad Ka Sangharsh "आजादी के बाद का संघर्ष" Book in Hindi- J.B. Kriplani

by J.B. Kriplani
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789355621610
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 228
  • Original Price: INR 800.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

आजादी की लड़ाई से भी ज्यादा आजाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कृपलानीजी का खास स्थान है। कृपलानी ने जोर-शोर से अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का निर्वाह किया। कृपलानी कभी चुप न रहे; और गांधी के नजरिए से सही क्या है—इस हिसाब से वह काम करते रहे। काफी फैसले उनके शोर मचाने से या ठीक मौके पर टोक देने भर से भी बदले।यह पुस्तक विशेष महत्व की है, क्योंकि हमारे पास आजादी के बाद की बड़ी घटनाओं पर पुस्तक के नाम पर अखबारी कतरनों के संग्रह के अलावा कुछ नहीं पढ़ने को मिलता।छत्तीस लेखों के माध्यम से आचार्यजी हमें आजाद भारत की शीर्ष की राजनीति के दाँव-पेंच (और कई बार की दुरभिसंधियों) के साथ शीर्ष के लोगों के आचरण को बताते हैं, चुनावी गड़बड़ और भ्रष्टाचार के गठजोड़ के किस्से बताते हैं, खुद इनके भुक्तभोगी होने का प्रसंग ले आते हैं। चीनी आक्रमण, गोवा की मु€त का आंदोलन, चीन द्वारा तिब्बत हड़पने की कहानी, भूदान के तूफान, राज्यों के भाषायी आधार पर पुनर्गठन का प्रसंग, पुलिस और शासन की ज्यादतियों के बड़े प्रसंग, पंचवर्षीय योजनाओं की समीक्षा, विदेश नीति की समीक्षा समेत काफी सारे विषयों पर उनकी अंतर्दृष्टि है। ये जरूरी और स्तरीय जानकारियाँ तथा जबरदस्त ईमानदारी का विश्लेषण उन सबको जरूर पढ़ना चाहिए, जिन्हें आजाद भारत के पहले तीन दशकों के शासन, नीतियों, फैसलों, घटनाओं और राजनीति के बारे में स्तरीय जानकारी पाने की भूख है।आजादी की लड़ाई से भी ज्यादा आजाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कृपलानीजी का खास स्थान है। कृपलानी ने जोर-शोर से अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का निर्वाह किया। कृपलानी कभी चुप न रहे; और गांधी के नजरिए से सही क्या है—इस हिसाब से वह काम करते रहे। काफी फैसले उनके शोर मचाने से या ठीक मौके पर टोक देने भर से भी बदले।यह पुस्तक विशेष महत्व की है, क्योंकि हमारे पास आजादी के बाद की बड़ी घटनाओं पर पुस्तक के नाम पर अखबारी कतरनों के संग्रह के अलावा कुछ नहीं पढ़ने को मिलता।छत्तीस लेखों के माध्यम से आचार्यजी हमें आजाद भारत की शीर्ष की राजनीति के दाँव-पेंच (और कई बार की दुरभिसंधियों) के साथ शीर्ष के लोगों के आचरण को बताते हैं, चुनावी गड़बड़ और भ्रष्टाचार के गठजोड़ के किस्से बताते हैं, खुद इनके भुक्तभोगी होने का प्रसंग ले आते हैं। चीनी आक्रमण, गोवा की मु€त का आंदोलन, चीन द्वारा तिब्बत हड़पने की कहानी, भूदान के तूफान, राज्यों के भाषायी आधार पर पुनर्गठन का प्रसंग, पुलिस और शासन की ज्यादतियों के बड़े प्रसंग, पंचवर्षीय योजनाओं की समीक्षा, विदेश नीति की समीक्षा समेत काफी सारे विषयों पर उनकी अंतर्दृष्टि है। ये जरूरी और स्तरीय जानकारियाँ तथा जबरदस्त ईमानदारी का विश्लेषण उन सबको जरूर पढ़ना चाहिए, जिन्हें आजाद भारत के पहले तीन दशकों के शासन, नीतियों, फैसलों, घटनाओं और राजनीति के बारे में स्तरीय जानकारी पाने की भूख है।

आचार्य जे.बी. कृपलानीजन्म : सन् 1888, हैदराबाद, सिंध।शिक्षा : हैदराबाद व मुंबई। पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से इतिहास में एम.ए. 1909। अध्यापन (मुजफ्फरपुर, बिहार) 1912-1917। चंपारण सत्याग्रह (1917) में महात्मा गांधी के सहयोगी। पं. मदनमोहन मालवीय, कांग्रेस अध्यक्ष के सहायक 1918। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर 1919-1920। असहयोग आंदोलन में विश्वविद्यालय से त्यागपत्र 1920। श्री गांधी आश्रम की स्थापना 1920; 1971 तक श्री गांधी आश्रम के निदेशक। प्राचार्य, गुजरात विद्यापीठ 1922-27। खादी और स्वाधीनता संग्राम के काम-काज में सक्रिय 1927-34। 1947 में सेंट्रल रिलीफ कमिटी की स्थापना, कुछ ही वर्षों बाद कृष्णानंद चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना, कांग्रेस महसचिव 1934-46, कांग्रेस के 57वें अध्यक्ष 1946-47, नीतिगत मतभेद होने पर कांग्रेस अध्यक्ष पद से नवंबर 1947 में त्यागपत्र। 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़े और हारे, पुरुषोत्तम दास टंडन जीते। ‘विजिल’ पत्रिका प्रारंभ 1950। ‘कांग्रेस डेमोक्रेटिक फ्रंट’ की स्थापना 1951। कांग्रेस से इस्तीफा और किसान-मजदूर प्रजा पार्टी की स्थापना 1951। सोशलिस्ट पार्टी में किसान-मजदूर प्रजा पार्टी का विलय 1952 और प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी ‘प्रसोपा’ का गठन, प्रसोपा के अध्यक्ष 1952, प्रसोपा के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र नवंबर 1954। प्रसोपा से अलग हुए और निर्दलीय राजनीति प्रारंभ 1960।संसदीय जीवन : 1. संविधान सभा के सदस्य 1946-50; २. अंतरकालीन संसद् में सदस्य 1950-52।लोकसभा सदस्य : सन् 1952 में किसान-मजदूर प्रजा पार्टी के अध्यक्ष के रूप में फैजाबाद से चुनाव लड़े और हारे। 1953 में भागलपुर-सहरसा चुनाव क्षेत्र से एक उपचुनाव में जीते। 1957-62 के लोकसभा चुनाव में सीतामढ़ी से जीते। 1962 के आम चुनाव में बंबई से वी.के. कृष्ण मेनन के मुकाबले हारे। 1963 में अमरोहा उपचुनाव काँटे की लड़ाई में जीते। 1967 के आम चुनाव में रायपुर से हारे। 1976 के उपचुनाव में गुना से जीते। 1971 का चुनाव नहीं लड़ा, आगरा से प्रस्ताव था। 1977 में जनता पार्टी के लिए प्रचार किया।जेल-यात्राएँ : 1917, 1921, 1930, 1934 (दो बार) और 1942।पुस्तकें : गांधी-जीवन और दर्शन; गांधी दर्शन; गांधी मार्ग; अहिंसक क्रांति; सर्वोदय और लोकतंत्र; सर्वोदय और पंचवर्षीय योजना; प्रजा सोशलिस्ट पार्टी; दि फ्युचर ऑफ दि कांग्रेस; फ्रीडम इन पेरिल; ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी; इंडियन नेशनल कांग्रेस; दि पॉलिटिक्स ऑफ चरखा; वर्ग संघर्ष; 54वें कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्षीय भाषण; तिब्बत; योजना : गांधी की कसौटी पर; गांधी : एक राजनीतिक अध्ययन; माई टाइम्स; मेरा दौर : एक आत्मकथा, आँखों देखी आजादी की लड़ाई; आजादी के बाद का संघर्ष।निधन : 19 मार्च, 1982।

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