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Baghavat Aur Wafadari: Navjagran Ke Ird-Girdh

by Vir Bharat Talwar
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789355188656
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 152
  • Original Price: INR 399.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

19वीं सदी के हिन्दू-मुस्लिम नवजागरण की जितनी भी भद्रवर्गीय धाराएँ थीं, सबने अपने धर्म की रक्षा और सुधार के लिए जिन विचारों और उपायों का सहारा लिया, उन सबका नतीजा हिन्दू-मुस्लिम अलगाव को और बढ़ाने में निकला। विदेशी (ईसाई) धर्म और संस्कृति का मुक़ाबला करते हुए उन्होंने अपने-अपने धर्म की रक्षा ज़रूर की और अपनी धार्मिक रूढ़ियों का विरोध करते हुए धर्म को सुधारने की कोशिश भी ज़रूर की, लेकिन यह काम उन्होंने इस तरीके से किया कि विभिन्न धर्मों को माननेवालों के बीच भेद-भाव की दीवारें और मज़बूत हुईं। धर्म की रक्षा का उद्देश्य सामने रखते हुए उन्होंने सभी भारतीयों की एकता को बढ़ावा देने का उद्देश्य सामने कतई नहीं रखा। “अन्य मत की पूजा या भिन्नों से मिलना-जुलना और उनके नाम का खाना-पीना छूट जायेगा”- ऐसे उद्देश्य को साधने वाला नवजागरण भारतीय समाज की एकता को कैसे आगे बढ़ाता? उलटे वह उस एकता को तोड़ता था। बहुत-से धर्मों को मानने वाले देश में धर्मसुधारकों का यह दावा कि उन्हीं के धर्म को मान लेने से राष्ट्रवाद पैदा हो सकता है-एक नामुमकिन और बेबुनियाद ख़याल था।श्रद्धाराम के धार्मिक विचारों का एक पक्ष ऐसा भी है जिसकी चर्चा अब कम होती है, लेकिन एक समय में वह पक्ष चर्चित ही नहीं, विवादास्पद भी था। अपने धार्मिक चिन्तन में श्रद्धाराम एक ऐसी जगह भी पहुँचते हैं जहाँ उनके अध्यात्मबोध में ईश्वर का होना भी बहुत ज़रूरी नहीं रह जाता है। इस बात को रामचन्द्र शुक्ल ने भी एक दूसरी तरह से नोट किया है। पंजाब में हिन्दू धर्म का स्तम्भ समझे जाने वाले इस विद्वान के स्वतन्त्र विचारों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि कई बार वे ऐसी बातें कह और लिख जाते थे जो कट्टर अन्धविश्वासियों को खटक जाती थीं और कुछ लोग इन्हें नास्तिक तक कह देते थे।- इसी पुस्तक से एक अंश

वीर भारत तलवारजन्म : 20 सितम्बर, 1947, जमशेदपुर (झारखण्ड)शिक्षा : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी) । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएच.डी. । भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दो बार फेलो। जे.एन.यू. में 24 वर्ष अध्यापन ।1970 के दशक वामपन्थी आन्दोलन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय । अलग झारखण्ड राज्य आन्दोलन के सिद्धान्तकारों में एक । तीन पत्रिकाओं-पटना से फिलहाल (1972-74), धनबाद से शालपत्र (1977-78) और राँची से झारखण्ड वार्ता (1977-78) का सम्पादन- प्रकाशन । आदिवासी इलाकों में बड़े बाँधों के विकल्प पर शोध तथा राँची विश्वविद्यालय में आदिवासी भाषाओं का विभाग खुलवाने में विशेष भूमिका ।प्रकाशन : किसान, राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द : 1918-22, राष्ट्रीय आन्दोलन और साहित्य, रस्साकशी, सामना (सभी वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली) । झारखण्ड के आदिवासियों के बीच, भारतीय ज्ञानपीठ। हिन्दू नवजागरण की विचारधारा: सत्यार्थ प्रकाश, राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द : प्रतिनिधि संकलन (सम्पादन), राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द (मोनोग्राफ), नक्सलबाड़ी के दौर में (सम्पादन), झारखण्ड आन्दोलन के दस्तावेज़, खण्ड 1, 2 और झारखण्ड में मेरे समकालीन ।सम्मान : झारखण्ड के आदिवासियों द्वारा दिया 'भगवान बिरसा पुरस्कार' (1988-89) तथा 'झारखण्ड रत्न' की उपाधि से विभूषित (2003)।ईमेल : virbharattalwar@gmail.com

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