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Bapu Ke Kadamon Mein

by Dr Rajendra Prasad
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788173157455
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 290
  • Original Price: INR 500.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 193 grams
  • BISAC Subject(s): Short Stories (single author)

बापू के कदमों मेंभारतवासियों का एक बड़ा कर्तव्य यह है कि महात्माजी के अधूरे काम को वे पूरा करें। इसीलिए महात्माजी ने ग्यारह व्रतों का प्रतिपादन किया था, जिन्हें प्रार्थना के समय वह बराबर दोहराया करते थे। वे व्रत हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह, आत्मनिर्भरता, शरीर-श्रम, अस्वाद, सर्वधर्म समानता, स्वदेशी, स्पर्श-भावना। ये सब वे ही धर्म और नियम हैं, जो हमारे शास्‍‍त्रों में बताए गए हैं। बापू ने हमें व्यक्‍तिगत, सामाजिक और राष्‍ट्रीय स्वतंत्रता दिलाने का प्रयत्‍न किया। हमको सिखाया कि व्यक्‍तिगत जीवन में और सामाजिक तथा राष्‍ट्रीय जीवन में कोई अंतर नहीं है। इसलिए जो कुछ व्यक्‍ति के लिए अहितकर है अथवा निषिद्ध है, वह समाज और राष्‍ट्र के लिए भी।आज हम अपने जीवन को तभी सार्थक बना सकते हैं, जब अपने हृदय के हर कोने को टटोलकर देख लें कि उसमें कहीं गांधीजी की शिक्षा के विरुद्ध कोई छिपी हुई कुवृत्ति तो काम नहीं कर रही है!जिन्होंने गांधीजी के आदर्शों और सिद्धांतों को सही मायने में आत्मसात् किया, ऐसे देशरत्‍न डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा लिखित बापू के अमिट पदचिह्नों का अद‍्भुत वर्णन है बापू के कदमों में।

गांधी युग के अग्रणी नेता देशरत्‍न राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर,1884 को बिहार के सारण जिला के ग्राम जीरादेई में हुआ। आरंभिक शिक्षा जिला स्कूल छपरा तथा उच्च शिक्षा प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता में। अत्यंत मेधावी एवं कुशाग्र-बुद्धि छात्र, एंट्रेंस से बी.ए. तक की परीक्षाओं में विश्‍वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्‍त, एम.एल. की परीक्षा में पुन: प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्‍त। 1911 में वकालत प्रारंभ, पहले कलकत्ता और फिर पटना में प्रैक्टिस।छात्र-जीवन से ही सार्वजनिक एवं लोकहित के कार्यों में गहरी दिलचस्पी। बिहारी छात्र सम्मेलन के संस्थापक। 1917-18 में गांधीजी के नेतृत्व में गोरों द्वारा सताए चंपारण के किसानों के लिए कार्य। 1920 में वकालत त्याग असहयोग आंदोलन में शामिल। संपूर्ण जीवन राष्‍ट्र को समर्पित, कांग्रेस संगठन तथा स्वतंत्रता संग्राम के अग्रवर्ती नेता। तीन बार कांग्रेस अध्यक्ष, अंतरिम सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री, संविधान सभा अध्यक्ष के रूप में संविधान-निर्माण में अहम भूमिका। 1950 से 1962 तक भारतीय गणराज्य के राष्‍ट्रपति। प्रखर चिंतक, विचारक तथा उच्च कोटि के लेखक एवं वक्‍ता। देश-विदेश में अनेक उपाधियों से सम्मानित, 13 मई, 1962 को ‘भारत-रत्‍न’ से अलंकृत।सेवा-निवृत्ति के बाद पूर्व कर्मभूमि सदाकत आश्रम, पटना में निवास। जीवन के अंतिम समय तक देश एवं लोक-सेवा के पावन व्रत में तल्लीन।

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