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Bharatiya Gram Shrinkhla - 2 Grameen Vikas: Pariprekshya, Neetiyan Aur Karyakram

by Ed. by Surinder S. Jodhka
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789389012811
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 294
  • Original Price: INR 350.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): Sociology / General

“ग्रामीण भारत के जीवन के विविध् आयामों से सम्बन्ध्ति विद्वत्तापूर्ण और अनुसन्धनपरक आलेखों से बनी यह पुस्तक अपने आप में अनूठी है। इस पुस्तक के संकलित आलेखों में सामाजिक एवं लैंगिक संरचनात्मक परिवर्तन, सामुदायिक विकास, ग्रामीण विद्युतीकरण, हरित क्रान्ति, ग्रामीण राजनीति जैसे पहलुओं से भारतीय ग्रामीण जीवन के विविध आयामों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है”

सुरिन्दर एस. जोधका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं। इन्होंने सामाजिक असमानताओं के नये और पुराने विभिन्न आयामों और उनके पुनरुत्पादन की प्रक्रियाओं पर शोध किया है। इन्होंने अनुभवसिद्ध स्तर पर अपने शोध में समकालीन भारत में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की प्रकृति के साथ जाति की गतिकी और इसकी अभिव्यक्ति के विविध तरीक़ों पर ध्यान केन्द्रित किया है। इसके अलावा, इन्होंने खेतिहर सामाजिक संरचना और ग्रामीण परिवर्तन की प्रकृति तथा सामुदायिक पहचानों के राजनीतिक समाजशास्त्र का भी अध्ययन किया है। इनकी हाल में प्रकाशित हुई पुस्तकें हैं : मैपिंग द इलीट (ज्यूलेस नॉडेट के साथ सम्पादित) ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2019; कॉन्टेस्टेड हायरार्कीज़ : कास्ट ऐंड पॉवर इन 21st सेंचुरी, ओबीएस (जम्र मेनर के साथ सम्पादित) 2018; द इंडियन मिडिल क्लास, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (असीम प्रकाश के साथ सम्पादित); कास्ट इन कॉन्टेम्पररी इंडिया, रूटलेज 2015/2018; कास्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012; विलेज सोसायटी, ओबीएस, 2012; वर्ष 2012 में इन्हें विशिष्ट समाजवैज्ञानिक का आईसीएसएसआर अमर्त्य सेन पुरस्कार मिला। वे यह पुरस्कार हासिल करने वाले आरम्भिक समाजशास्त्रियों में से एक थे।कमल नयन चौबे दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में जातियों का राजनीतिकरण : बिहार में पिछड़ी जातियों के उभार की दास्तान (2008), और जंगल की हक़दारी : राजनीति और संघर्ष (2015) सम्मिलित हैं। इन्होंने जॉन रॉल्स और विल किमलिका जैसे सुप्रसिद्ध राजनीतिक सिद्धान्तकारों की कृतियों का हिन्दी अनुवाद किया है। ये विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) से प्रकाशित होने वाली समाज विज्ञान की पूर्व-समीक्षित पत्रिका प्रतिमान : समय समाज संस्कृति की सम्पादकीय टीम से भी जुड़े हैं।

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