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Bhasha Sahitya Aur Sanskriti Shikshan

by Prof. Dilip Singh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181436191
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 224
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): Linguistics / General

भाषा साहित्य और संस्कृति शिक्षण - भारत की बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक संरचना में दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण की अपनी आवश्यकताएँ और समस्याएँ हैं। विदेशी भाषा के रूप में भी हिन्दी शिक्षण की अलग माँग है। फिर भी अन्य भाषा हिन्दी शिक्षण पर हिन्दी में पुस्तकों का नितान्त अभाव हैं। इस तरह की जो किताबें हिन्दी में प्रकाशित हैं उनमें में अधिकतर व्याकरण-शिक्षण की परिधि तक सीमित है। इसका एक कारण तो यह है कि इन पुस्तकों के लेखक या तो शुद्ध भाषावैज्ञानिक हैं या हिन्दी के वैयाकरण अतः वे सिद्धान्त चर्चा से बाहर नहीं निकल पाते और संरचना केन्द्रित भाषा शिक्षण को ही भाषा अधिगम का प्रथम और अन्तिम सोपान मानते हैं।दूसरा कारण यह है कि भाषावैज्ञानिक पृष्ठभूमि के इन लेखकों की साहित्य-भाषा में तनिक भी रुचि नहीं है जबकि अन्य भाषा के शिक्षण का बहुत बड़ा हिस्सा पाठ केन्द्रित होता है। भारत के भाषाविद् और साहित्यवेत्ता दो खेमों में बँटे हुए हैं। भाषाविज्ञानी साहित्य से और साहित्यकार आलोचक भाषाविज्ञान से अपने को कोसों दूर रखते हैं। अन्य देशों में ऐसा नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं कि साहित्यिक कृति में भाषा अध्ययन की तथा भाषा में सर्जनात्मकता की अनन्त सम्भावनाएँ निहित हैं। कारण कुछ भी हों, अन्य भाषा शिक्षक को सम्बोधित सामग्री का हिन्दी में नितान्त अभाव है, इसमें दो राय नहीं। हिन्दीतर क्षेत्रों तथा विश्व के अन्य देशों में हिन्दी पढ़ानेवालों को यह पुस्तक ध्यान में रखकर तैयार की गयी है।अतः अन्य भाषा शिक्षण की पृष्ठभूमि, भाषा तथा भाषा-शिक्षण की अधुनातन संकल्पनाओं का सरल विवेचन इस पुस्तक की अपनी विशेषता है। अन्य भाषा-शिक्षण के इतिहास का लेखाजोखा देनेवाली और समय-समय पर इस ज्ञान क्षेत्र में आये परिवर्तनों की ओर संकेत करने वाली यह हिन्दी में पहली पुस्तक है।भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण के बीच अन्तःक्रियात्मक प्रणाली का प्रतिपादन करने से यह पुस्तक अधिगम विकास की उस संकल्पना को साकार करती है, जिसमें शिक्षण की एक सीमा के बाद भाषा-अध्येता स्वतः अपने प्रयास से अपनी भाषायी और भाषा प्रयोग की शक्ति का विकास करने की और उद्यत होता है।

प्रो. दिलीप सिंह - जन्म काशी में शिक्षा-दीक्षा भी नहीं। हिन्दी भाषाविज्ञान के प्रखर अध्येता अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की सभी शाखाओं में लेखन और चिन्तन। समाज भाषाविज्ञान और शैलीविज्ञान में विशेष रुचि। साहित्य और भाषाविज्ञान दोनों में समाज गति रखनेवाले समाजभाषाविद। प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव और पं. विद्यानिवास मिश्र के शिष्यत्व में निर्मित अनूठा लेखकीय व्यक्तित्व।फ्रांस और अमरीका में हिन्दी शिक्षण तथा शिक्षण सामग्री निर्माण का दीर्घ अनुवाद। दक्षिण भारत में उच्च स्तरीय हिन्दी अध्यापन और शोध-निर्देशन से लम्बी अवधि तक सम्पृक्ति। शैलीविज्ञान, अनुवाद विज्ञान, भाषा शिक्षण, समाज भाषा विज्ञान, प्रयोजनमूलक हिन्दी के विविध पक्षों पर पुस्तकों का लेखन सम्पादन और आलेखों का प्रकाशन प्रो. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव के लेखों का सह-सम्पादन- हिन्दी भाषा का समाजशास्त्र- डॉ. महेन्द्र, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान-डॉ. सूरजभान सिंह और साहित्य का भाषिक चिन्तन-नामवर सिंह के साथ हिन्दी जगत में एक जाना-पहचाना नाम।

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