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Bhasha Yugbodh Aur Kavita

by Ramvilas Sharma
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350005248
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 240
  • Original Price: INR 550.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 4th Edition
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): Essays

कहने में कितना अच्छा लगता है-साहित्य समाज का दर्पण है और कितने आलोचकों ने नहीं कहा, साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब है, परन्तु कितने आलोचकों ने अपने कहने की सचाई का अनुभव किया है और अनुभव करके उसके अनुसार आचरण किया है? समाज में मनुष्यों के पारस्परिक सम्बन्ध बदले हैं, उनके भावों और विचारों में परिवर्तन हुए हैं, परिस्थितियाँ बदली हैं और उनके साथ 'मनुष्यत्व' की परिभाषाएँ भी बदली हैं। साहित्य के भाव, विचार, उनको व्यक्त करने के ढंग गतिशील युग-प्रवाह में बदलते रहे हैं । उनके इस बदलने के क्रम को, इस बहाव को, स्थायी कहा जा सकता है। परन्तु साहित्य और समाज के सम्बन्ध की यह व्याख्या स्वीकार करने वाले लोग कम हैं ।समाजवादी और प्रगतिशील कवियों के लिए न तो रोमांटिक कवि आदर्श हैं न रीतिकालीन । परन्तु दोनों की तुलना में अधिक महत्त्व रोमांटिक कवियों को ही दिया जायेगा । रीतिकालीन कवियों की संस्कृति ही ऐसी होती है कि प्रत्येक देश और समाज का भला चाहने वाला उसका शत्रु हो जायेगा। उनकी भाषा पर दरबारी संस्कृति की गहरी छाप रही है, इस बात से कौन इनकार करेगा ? प्रगतिशील कवि के लिए भाषा को सरल और सुबोध बनाना आवश्यक है। परन्तु रीतिकालीन और डिकेडेंट कवियों की भाषा-माधुरी से उसे बचाना होगा। इंगलैंड में ऑस्कर वाइल्ड, ओ शौनेसी, पेटर आदि इसी तरह के डिकेडेंट साहित्यिक थे। पुराने कवियों से भाव चुराकर उन्होंने भाषा और शैली में एक बनावटी मिठास पैदा कर दी थी। उनका आदर्श स्वस्थ साहित्य के लिए घातक है। ऐसे ही रीतिकालीन दरबारी कवियों का आदर्श यह रहा है कि जो कुछ वे कहें उसमें चमत्कार अवश्य हो, जिससे सुनने वाले वाह-वाह कर उठें ! जो बात कही जाय वह चाहे महत्त्वपूर्ण न हो, कहने का ढंग अनोखा होना चाहिए। इस रीतिकालीन आदर्श को साहित्य के लिए चिरन्तन मान लेना साहित्य के विकास में काँटे बिछाना है।

रामविलास शर्मा10 अक्टूबर, 1912 को जिला उन्नाव के ऊँचगाँव सानी में जन्म। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 में बी.ए. और 1935में अंग्रेज़ी साहित्य से एम.ए.। 1938 से 1943 तक लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी अध्यापक । 1943 से 1971 तक बलवन्त राजपूत कॉलेज, आगरा में अध्यापन। 1974 तक के. एम. हिन्दी संस्थान के निदेशक रहने के बाद अवकाश ग्रहण ।देशभक्ति तथा मार्क्सवादी चेतना रामविलास जी की आलोचना का केन्द्र-बिन्दु है। उनकीलेखनी से वाल्मीकि तथा कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक की रचनाओं का मूल्यांकन प्रगतिवादी चेतना के आधार पर हुआ। उन्हें न केवल प्रगति-विरोधी हिन्दी आलोचना की कला एवं साहित्य-विषयक भ्रान्तियों के निवारण का श्रेय है, वरन् स्वयं प्रगतिवादी आलोचना द्वारा उत्पन्न अन्तर्विरोधों के उन्मूलन का गौरव भी प्राप्त है।रामविलास जी को निराला की साहित्य साधना पुस्तक पर 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त वे 1988 में 'श्लाका सम्मान', 1990 में 'भारत भारती पुरस्कार', 1991 में ‘व्यास सम्मान' और 2000 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 'शताब्दी सम्मान' से सम्मानित । इन पुरस्कारों की राशि को देश में साक्षरता के प्रसार के लिए दान।30 मई 2000 को निधन।

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