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Bindo Ka Ladka

by Sharat Chandra Chattopadhyaya
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352662708
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 168
  • Original Price: INR 300.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

इसे वे ही नहीं बल्कि बाहर के लोग भी भूल गए थे कि यादव मुखर्जी और माधव मुखर्जी दोनों सगे भाई नहीं हैं। जाने कितनी तकलीफें उठाकर बेचारे यादव मुखर्जी ने अपने छोटे भाई माधव को कानून की शिक्षा दिलाई थी। बड़ी मेहनत व कोशिशों के बाद कहीं वे धनी-मानी जमींदार की एकमात्र संतान, पुत्री बिंदुवासिनी को अपनी भ्रातृ बहू बनाकर घर में लाए थे। बहू बिंदुवासिनी बहुत ही रूपवती थी, असाधारण सुंदरी। पहले ही दिन जब बहू बिंदुवासिनी अपना बेजोड़ रूप तथा दस हजार रुपयों के प्रामेसरी नोट लेकर घर में आई थी तब बड़ी बहू अन्नपूर्णा की आँखों से आनंद के आँसू लुढ़कने लगे थे। घर में सास-ननद तो थी नहीं। वे ही घर की मालकिन थीं। उसी दिन छोटी देवरानी का मुँह अपने हाथों से ऊपर उठाकर उन्होंने जाने कितने गर्व से पड़ोसिनों के सामने कहा था ‘घर में बहू आवे तो ऐसी! हूबहू लक्ष्मी का रूप।’ मगर दो ही दिनों में उन्हें पता लग गया कि उनका सोचना गलत था। दो ही दिन में सर्वविदित हो गया कि बहू अपने साथ जिस नाप-तौल से रूप व रुपया लाई है उससे कई गुना ज्यादा अहंकार व अभिमान भी साथ लेती आई है। फौरन ही बड़ी बहू ने अपने पति को एक ओर बुलाकर कहा, ‘क्यों जी, क्या रूप और रुपयों की गठरी को ही देखकर बहू को ले आए थे, जाना-पहचाना भी था? यह तो काली नागिन है, नागिन!

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय(15 सितंबर, 1876—16 जनवरी, 1938) बांग्ला के ऐसे कथाकार थे, जो जन्मजात लेखन प्रतिभा के साथ इस दुनिया में आए थे। 18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘बासा’ (घर) शीर्षक से एक उपन्यास लिख दिया था, जो छपा तो नहीं, लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षी और नैसर्गिक रचनात्मक प्रतिभा का एक साक्ष्य बना। उनका शुरुआती जीवन अभावग्रस्त रहा। रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय उनके प्रेरणास्रोत रहे। आजीविका के लिए उन्होंने क्लर्की की, लेकिन जल्दी की समझ गए कि वे केवल लिखने के लिए बने हैं। शरतचंद्र का पहला चर्चित उपन्यास ‘श्रीकांत’ था, लेकिन धारावाहिक रूप में प्रकाशित पहली चर्चित रचना ‘बड़ी दीदी’ थी। इस रचना ने उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया। शुरुआत में ही उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। उनके उपन्यास ‘चरित्रहीन’ को ‘सदाचार के विरुद्ध’ कहकर उसे लौटा दिया गया। असल में शरत लीक से हटकर सोचने और लिखनेवाले एक विद्रोही कथाकार के रूप में सामने आए। शरतचंद्र ने 25 उपन्यास, 4 नाटक, 16 कहानी-संग्रह और लगभग एक दर्जन निबंध-संग्रह बांग्ला साहित्य को दिए। वे मूल रूप से बेशक बांग्ला कथाकार थे, लेकिन लगभग सभी भारतीय भाषाओं में उनकी रचनाओं के अनुवाद हुए हैं। हिंदी में तो उनकी रचनाएँ इतनी अनूदित हुईं कि वे हिंदी के ही लेखक लगते हैं। उनकी रचनाओं पर कई चर्चित हिंदी फिल्में भी बनीं।

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