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Chikitsa Vyavastha Par Vyangya

by Giriraj Sharan Agrawal
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788173151484
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 148
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

अस्पताल हो और वह भी सरकारी तो उसका अपना अलग ही आनंद है । बस, शर्त यह है कि आपमें इस अद‍्भुत पर्यटन- स्थल में आनंद लेने की क्षमता अवश्य हो । ' क्षमता ' शब्द यहाँ हमारे विचार में अधिक उपयुक्‍त नहीं है, अंग्रेजी का ' स्टेमना ' अधिक उपयुक्‍त, सटीक एवं सार्थक है । वह जो किसी शायर ने कहा था-' सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ ' तो उसका संकेत निश्‍च‌ित रूप से अस्पताल की ओर ही था और सैर से उसका मतलब भ्रमण नहीं था, जनरल वार्ड की शय्या से ही था । तो शायर कहना चाहता था कि यदि आपने किसी अस्पताल के जनरल वार्ड में दो - चार दिन रहकर दुनिया की सैर नहीं की है तो समझ लीजिए, आपने कुछ नहीं किया । जिस प्रकार डॉक्टरों में विविध रोग विशेषज्ञ होते हैं ठीक उसी प्रकार मरीजों में भी अस्पताल विशेषज्ञ होते हैं । वे जानते हैं कि अस्पताल तक जाने, डॉक्टर तक पहुँचने तथा इलाज करवाने की सबसे बढ़िया विधि क्या है? इसलिए हमारी सलाह है कि आप जब भी बीमार हों, इन सिद्धहस्थ अस्पताल विशेषज्ञों की सेवाएँ अवश्य प्राप्‍त करें ।हम सोचने लगे हैं कि अस्पतालों के गुण- अवगुण की जाँच अवश्य होनी चाहिए, सो हमने आज कुछ अस्पताल विशेषज्ञों को आमंत्रित किया है, ताकि हम और आप उनके अनुभवों का लाभ उठा सकें और जान सकें कि सुनी-सुनाई और अनुभव की हुई में क्या अंतर होता है ।चिकित्सा जगत् की विसंगतियों का पर्दाफाश करते ये व्यंग्य आपको भोगे यथार्थ का परिचय कराएँगे और तब आप इनकी धार से घायल होने का मात्र अभिनय नहीं कर पाएँगे ।

गिरिराज शरणजन्म : सन् 1944, संभल (उप्र.) डॉ. गिरिराज शरण की पहली पुस्तक सन् 1964 में प्रकाशित हुई । तब से अनवरत साहित्य-साधना में रत आपकी लिखी एवं संपादित एक सौ के लगभग पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपने साहित्य की प्राय: प्रत्येक विधा में साहित्य-सृजन किया है । हिंदी गजल में आपकी सूक्ष्म और धारदार सोच को गंभीरता से स्वीकार किया गया है ।कहानी, एकांकी, व्यंग्य, ललित निबंध और बाल साहित्य के लेखन में गतिपूर्वक सलग्न डॉ. गिरिराज वर्तमान में वर्धमान महाविद्यालय, बिजनौर (उप्र.) के स्नातकोत्तर एवं शोध विभाग में वरिष्‍ठ हिंदी प्रवक्‍ता हैं ।हिंदी शोध तथा संदर्भ-साहित्य की दृष्‍ट‌ि से प्रकाशित उनके विशिष्‍ट ग्रंथों— शोध-संदर्भ (तीन भाग), तुलसीमानस संदर्भ तथा सूर साहित्य-सदर्भ-को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्‍त है ।

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