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Cinema Kal, Aaj, Kal

by Vinod Bhardwaj
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789389012521
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 516
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 550 grams
  • BISAC Subject(s): Film / General

सुपरिचित फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज तीन दशकों से भारतीय और विश्व सिनेमा के विशेषज्ञ के रूप में धर्मयुग, दिनमान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, आउटलुक साप्ताहिक आदि देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते रहे हैं। 'दिनमान' के संपादक रघुवीर सहाय के अनुरोध पर उन्होंने कॉलेज के दिनों में ही चुनी हुई विदेशी फिल्मों पर लिखना शुरू कर दिया था। बाद में 'धर्मयुग' में धर्मवीर भारती के कहने पर उन्होंने हिंदी फिल्म समीक्षा का कालम लिखा। 'दिनमान' के संपादकीय विभाग के एक सदस्य के रूप में विनोद भारद्वाज लंबे समय तक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों पर लिखते रहे। 'नवभारत टाइम्स' में कई साल तक उन्होंने फिल्म समीक्षा का कालम लिखा और इन दिनों वह 'आउटलुक' साप्ताहिक के फिल्म समीक्षक हैं। पिछले 32 सालों में विनोद भारद्वाज ने सिनेमा पर जो लिखा उसका एक प्रतिनिधि चयन इस पस्तक में शामिल है। लेखक के पास विश्व सिनेमा को जानने जाँचने के पर्याप्त औजार हैं और भारतीय सिनेमा की परंपरा से भी वह गहरे स्तर पर जुड़े हैं। मुंबइया लोकप्रिय सिनेमा पर भी उन्होंने एक अलग नजरिए से लिखा है। आवरण चित्र बुद्धदेव दासगुप्त की फिल्म 'मंदो मेयेर उपाख्यान' (2002) का एक दृश्य

1948 में लखनऊ में जन्मे विनोद भारद्वाज ने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1971 में मनोविज्ञान में एम.ए. किया। 1967-69 में वह अपने समय की बहुचर्चित पत्रिका ‘आरम्भ’ के एक सम्पादक थे। 1973 से 1998 तक वह टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हिन्दी प्रकाशनों से पत्रकार के रूप में जुड़े रहे। धर्मवीर भारती के ‘धर्मयुग’ में प्रारम्भिक प्रशिक्षण के बाद वह लम्बे समय तक ‘दिनमान’ से जुड़े रहे जहाँ रघुवीर सहाय ने उनसे आधुनिक जीवन, विचार, फ़िल्म और कला पर नियमित लिखवाया। नब्बे के दशक में तीन साल तक वह नवभारत टाइम्स के फीचर सम्पादक रहे। अब वह स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़िल्म निर्माण और आर्ट क्यूरेटर का काम करते हैं। 1989 में उन्हें लेनिनग्राद (रूस) के पहले ग़ैर कथाफ़िल्म अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव की अन्तरराष्ट्रीय ज्यूरी का एक सदस्य बनाया गया था। अभी तक हिन्दी के वह एक एकमात्र फ़िल्म समीक्षक हैं जिन्हें अन्तरराष्ट्रीय ज्यूरी के सदस्य बनाये जाने का यह दुर्लभ सम्मान मिला। 1981 में वर्ष की श्रेष्ठ कविता के लिए उन्हें भारतभूषण अग्रवाल सम्मान (उस साल के निर्णायक विष्णु खरे) मिला और 1982 में नामवर सिंह की अध्यक्षता में ज्यूरी ने उन्हें श्रेष्ठ सर्जनात्मक लेखन के लिए संस्कृति पुरस्कार दिया। उनके तीन कविता संग्रह (जलता मकान, होशियारपुर, होशियारपुर और अन्य कविताएँ), एक कहानी संग्रह (चितेरी) और दो उपन्यास (सेप्पुकु, सच्चा झूठ) छप चुके हैं। कला और सिनेमा पर उनकी अनेक चर्चित पुस्तकें हैं। उनका लिखा ‘वृहद् आधुनिक कला कोश’ वाणी प्रकाशन की एक बहुचर्चित पुस्तक है। ‘सेप्पुकु’ का ब्रज शर्मा द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद हार्पर कॉलिंस से छपा है जहाँ से इस साल के अन्त में ‘सच्चा झूठ’ का अंग्रेज़ी अनुवाद भी आ रहा है। विनोद भारद्वाज ने कला सम्बन्धी कुछ प्रयोगधर्मी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया है। ये फ़िल्में अमेरिका की प्रसिद्ध एलेक्जेंडर स्ट्रीट प्रेस द्वारा ऑनलाइन वितरण के लिए अनुबन्धित हैं।

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