Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Dalit Sahitya Aur Saundaryabodh

by Sharankumar Limbale
Save 32% Save 32%
Current price ₹335.00
Original price ₹495.00
Original price ₹495.00
Original price ₹495.00
(-32%)
₹335.00
Current price ₹335.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789369445431
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 352
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

दलित साहित्य वास्तववादी साहित्य है तथा वह जीवनमूल्यों का समर्थन करने वाला साहित्य है। सामाजिक परिवर्तन की ज़रूरत समाप्त नहीं हुई है। परिवर्तन के लिए लिखने की आवश्यकता है पढ़ने की भी आवश्यकता है। परिणामतः ध्यान रखना होगा कि कलावादी साहित्य पर पोषित अभिरुचि को करवट बदलने की ज़रूरत है स्वच्छन्दी, स्वान्तःसुखाय लेखक और कार्यकर्ता लेखक के बीच का अन्तर ध्यान में आते ही दोनों के लेखन का मूलभूत अन्तर ध्यान में आता ही है। पाठक को कार्यकर्ता लेखक समझ लेना चाहिए। यदि लेखक को कार्यकर्ता माना तो उसके साहित्य को कार्य मानना होता है परिणामतः कार्य का स्वरूप, उद्देश्य, भूमिका और प्रेरणा महत्त्वपूर्ण ठहरती है। कार्य का मूल्यांकन करते समय ईमानदारी, ज़िद, यश और प्रतिरोध की समझ जैसी बातों को अनदेखा नहीं कर सकते। कलावादियों की दलित साहित्यविषयक बात करते समय अड़चन होती है और इस बात का ख़ेद होता है कि दलित साहित्य के सम्बन्ध में साहित्यबाह्य बातों पर बोलना पड़ताI कलावादी और दलित लेखकों के कला की ओर देखने के दृष्टिकोण में बहुत अन्तर है। यह ध्यान रखना चाहिए कि इन दोनों साहित्य के लिए एक ही पैमाना प्रयुक्त नहीं कर सकते।—इसी पुस्तक से★★★दलित साहित्य ‘साहित्य' है या नहीं ऐसा प्रश्न यदि उपस्थित हुआ तो उसका उत्तर दलित साहित्य ‘साहित्य' है, ऐसा उत्तर देना होगा। यदि दलित साहित्य 'साहित्य' हो तो 'दलित साहित्य' कला है या नहीं, इसका उत्तर 'दलित साहित्य एक है कला है', ऐसा देना होता है। यदि दलित साहित्य कला है तो इस साहित्य के कला-मूल्यों पर विचार-विमर्श होना चाहिए या नहीं, ऐसा प्रश्न आगे आता है। दलित साहित्य के कला-मूल्यों पर विचार-विमर्श होना चाहिए, ऐसा कहना होता है। कलावादी साहित्य के 'कला-मूल्य' और जीवनवादी साहित्य के 'कला-मूल्यों' में भेद होता है? इसका विचार करना पड़ता है।यह ध्यान रखना चाहिए कि मूलतः 'कला' एक माध्यम है। दलित लेखकों का मानना है कि कला को साध्य न मानकर कला को साधन कहना चाहिए। कलावादी कला को 'साध्य' और ‘स्वायत्त’ मानते हैं तथा भूमिका लेना नकारते हैं। मूलतः कला को 'साध्य' और 'स्वायत्त' मानना भी एक भूमिका ही है। तानाशाही में कलाकार को तानाशाही के विरुद्ध बोलने का अधिकार नहीं होता। कलाकार को 'राजा' और 'इतिहास' का गरिमागान करना ही पड़ता है और कलाकार 'धर्म तथा प्रकृति' में रमने लगता है। राजा, इतिहास, धर्म और प्रकृति कलावादियों के चरागाह हैं कलावादी भूमिका नहीं लेते। वह तटस्थ रहता है। उसकी तटस्थता 'जैसे थे' की समर्थक होती है। जो व्यवस्था होती है वही स्थायी रहनी चाहिए। उसमें हस्तक्षेप करना यानी कला को निकृष्ट करना है, ऐसी इस निरुपद्रवी स्वच्छन्दी कलाकार की भूमिका होती है। मूलतः प्रस्तुत भूमिका परिवर्तनवाद का प्रखर विरोध करने वाली प्रतिगामी प्रवृत्ति होती है।—इसी पुस्तक से

शरणकुमार लिम्बाले दलित चिन्तक, लेखक, उपन्यासकार और कवि हैं। उनकी चौवालीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तकों का कई भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया है। वह अपनी आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं। उनकी पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ को अकादमिक जगत में काफ़ी सराहना मिली है। वह पहले दलित लेखक हैं जिन्हें भारतीय साहित्य के लिए भारत के सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक ‘सरस्वती सम्मान-2020’ मिला है। यह सम्मान उन्हें सनातन उपन्यास के लिए मिला। उनकी रचनाएँ कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। वह दलित साहित्य आन्दोलन के सशक्त स्तम्भ हैं। ★★★पद्मा पाटील शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर के हिन्दी विभाग की प्रोफ़ेसर और पूर्व अध्यक्ष एवं 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित प्रथम मराठी साहित्यकार वि.स. खाण्डेकर स्मृति संग्रहालय की निदेशक रह चुकी हैं। उनकी ‘समीक्षात्मक, अनूदित, सृजनात्मक तथा सम्पादित' पैंतालीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तक ‘मुक्तिबोध’ की कविता के लिए वे ‘हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखिका पुरस्कार' – 2005-06 (केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, नयी दिल्ली) से सम्मानित हो चुकी हैं। वे भारतीय विद्या संस्थान, त्रिनिदाद एंड टोबागो; वेस्टइंडीज द्वारा ‘त्रिनिदाद हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय शिखर सम्मान'-2011 से सम्मानित हुई हैं। उनकी रचनाओं के ओड़िया, कन्नड़, मराठी, असमिया, पोलिश, नेपाली भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us