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Farm House Ke Log

by Gopal Chaturvedi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788188267002
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 160
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): Short Stories (single author)

उनके एक समृद्ध दोस्त ने उन्हें समझाया कि बिना फार्म हाउस के शहर के बड़ों में उनका नाम नहीं होना । सफल नेता, उद्योगपति, व्यापारी वाकई बड़े तभी बनते हैं जब उनका फार्म हाउस बने ।उसने सलाह दी, '' सत्ताधारियों के पड़ोस से उनसे संपर्क बनेगा । नए धंधों की गुंजाइश बढ़ेगी । यह तुम्हारी कोठी भजन-पूजन के लिए ठीक है, आधुनिक स्टाइल के जीवन के लिए नहीं । ''पटरीवाले के पुत्र को दोस्त की बात जँच गई । वह देश-विदेश घूमा था । उसने तरह-तरह की वाइन-व्हिस्की चखी थी । मीट-बीफ का स्वाद उसे लग चुका था । फार्म हाउस होगा तो ' वीक-एंड ' ही क्यों, हर शाम वहाँ रंगीन हो सकती है । बाहर के मेहमान वहीं ठहर सकते हैं । फार्म हाउस की पार्टियों का मजा ही कुछ और है । वीर भी कई बार उनमें जा चुका है । हलकी रोशनी में पूल के किनारे शराब पीने और नई-नई लड़कियों के साथ ' डांस ' करने के आनंद का कोई डिस्को क्या मुकाबला करेगा! उसने देखा था कि ऐसी पार्टियों में सरकार के आला अफसर ऐसे दुम हिलाते हैं जैसे पार्टी देनेवाले के पालतू कुत्ते हों । अगर गलती से सपत्‍नीक आए तो मियाँ-बीवी अलग- अलग शिकार करते हैं ।-इसी पुस्तक से जीवंत भाषा और रोचक शैली में लिखे इन व्यंग्य लेखों का दायरा समाज, साहित्य, संस्कृति और सियासत तक फैला हुआ है । ये व्यंग्य लेख पाठक को गुदगुदाते भी हैं और सोचने को मजबूर भी करते हैं । ये व्यंग्य आम आदमी के नजरिए से जिंदगी की विषमताओं को उजागर करते हैं ।

लखनऊ में जनमे गोपाल चतुर्वेदी की शिक्षा ग्वालियर, भोपाल और प्रयाग विश्‍वविद्यालय, इलाहाबाद में हुई; जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी में एम. ए. किया । भारतीय प्रशासनिक सेवा के उच्च अधिकारी तथा 1965 से 1993 तक रेल की उच्च वित्तीय सेवा तथा भारत सरकार में अनेक पदों को सुशोभित कर चुके हैं ।छात्र जीवन से ही लेखन से जुड़े गोपाल चतुर्वेदी का एक काव्य संग्रह ' कुछ तो हो ' प्रकाशित हो चुका है । आप पिछले डेढ़ दशक से व्यंग्य-लेखन में सक्रिय हैं और हिंदी की सभी महत्त्वपूर्ण पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के अलावा ' सारिका ', ' इंडिया टुडे ' में कॉलम भी लिख चुके हैं । आजकल प्रतिष्‍ठ‌ित मासिक पत्रिका ' साहित्य अमृत ' में नियमित रूप से अपने व्यंग्य लिख रहे हैं । आपके व्यंग्य संग्रह हैं-' अफसर की मौत ', ' दुम की वापसी ', ' खंभों के खेल ', ' फाइल पड़ि- पड़ि ', ' आजाद भारत में कालू ', ' दाँत में फँसी कुरसी ', ' गंगा से गटर तक ', ' राम झरोखे बैठ के ', ' फार्म हाउस के लोग ', ' नैतिकता की लँगड़ी दौड़ ' और ' भारत और भैंस ' । भारत के पहले सांस्कृतिक समारोह ' अपना उत्सव ' के आशय गान- ' जय देश भारत भारती ' के रचयिता होने के साथ दो बार भारतीय रेल के ' प्रेमचंद पुरस्कार ' से सम्मानित गोपाल चतुर्वेदी आज के अग्रहणी व्यंग्यकारों में हैं।

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