Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Gandhi Aur Saraladevi Chaudhrani: Barah Adhyay

by Alka Saraogi
Save 32% Save 32%
Current price ₹202.00
Original price ₹299.00
Original price ₹299.00
Original price ₹299.00
(-32%)
₹202.00
Current price ₹202.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789355188793
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 216
  • Original Price: INR 299.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 4th Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): Literary

"अब यह बिछड़ना और अधिक कठिन लगने लगा है। जिस जगह तुम बैठती थीं, उस ओर मैं देखता हूँ और उसे खाली देखकर अत्यन्त उदास हो जाता हूँ।"-27 अप्रैल 1920 को गांधी लिखते हैं। जिस सरलादेवी चौधरानी की बौद्धिक प्रतिभा और देश की आज़ादी के यज्ञ में ख़ुद को आहुति बनाने का संकल्प देख गांधी ने अपनी 'आध्यात्मिक पत्नी' का दर्जा दिया, उसका नाम इतिहास के पन्नों में कहाँ दर्ज है? जिस सरलादेवी की शिक्षा और तेजस्विता से मुग्ध हो स्वामी विवेकानन्द उन्हें अपने साथ प्रचार करने विदेश ले जाना चाहते थे, उसे इतिहास ने बड़े नामों की गल्प लिखते समय हाशिए पर तक जगह क्यों नहीं दी? कलकत्ता के जोड़ासांको के टैगोर परिवार की संस्कृति में पली-बढ़ी सरलादेवी ने अपने मामा रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ 'वन्देमातरम्' की धुन बनायी, यह किसने याद रखा? इन प्रश्नों का उत्तर शायद एक स्त्री के स्वतन्त्रचेता होने और सवाल उठाने पर उसे दरकिनार किये जाने में है। गांधी के आस-पास के लोगों को सरलादेवी के प्रति गांधी का हार्दिक प्रेम उनकी ब्रह्मचारी-सन्त की छवि के लिए ख़तरा लगा। ख़ुद गांधी को असहयोग आन्दोलन पर सरला के उठाये सवाल सहन न हुए। चुभते हुए सवाल सरला ने बार-बार किये: कांग्रेस ने औरतों को क़ानून तोड़ने के लिए आगे रखा, क़ानून बनाते वक़्त क्यों नहीं? अलका सरावगी का उपन्यास सौ साल पहले घटे जलियाँवाला बाग़ के समय के उन विस्मृत किरदारों की एक गाथा है जो इतिहास की धूप-छाँव के बीच अपनी जगह बनाने में, अपने रूपक की तलाश में नये अध्याय रचते हैं। ऐसे ही बारह अध्यायों की एक कहानी है गांधी और सरला देवी चौधरानी की। इतना ही नहीं, यह केवल सरला देवी की नहीं, गांधी की भी कथा है। वे स्त्रियों को कैसे देखते थे, इसकी कथा है। एक मनुष्य जीवन जीने के तरीक़े में, देश के लिए लड़ने में, प्रेम करने में कैसे नैतिक हो सकता है, इसकी कथा है। सरला देवी चौधरानी और गांधी पर लिखा यह उपन्यास 'महात्मा' गांधी के मन की एक व्यक्ति के रूप में थाह देता है; साथ ही गांधी के उस मन की भी, जहाँ निजी और सार्वजनिक में कोई भेद नहीं है।

अलका सरावगी का जन्म 17 नवम्बर, 1960 को कलकत्ता में हुआ।उनके पहले उपन्यास कलिकथा वाया बाइपास पर उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2001) प्राप्त हुआ। यह उपन्यास अनेक भारतीय भाषाओं के अलावा इटालियन, फ़्रेंच, जर्मन, स्पेनिश भाषाओं में अनूदित हुआ; यह भारत एवं कैम्ब्रिज, ट्यूरिन, नेपल्स के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल है। उनके अन्य उपन्यास हैं-शेष कादम्बरी (के.के. बिरला फ़ाउंडेशन का बिहारी सम्मान), कोई बात नहीं, ब्रेक के बाद, जानकीदास तेजपाल मैंशन (अन्तरराष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान), एक सच्ची झूठी गाथा, कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए (कलिंगा लिटफ़ेस्ट का बुक ऑफ़ द ईयर अवार्ड-2021, वैली ऑफ़ वर्ज, देहरादून का अवार्ड-2021)। उनके दो कहानी संग्रह कहानी की तलाश में और दूसरी कहानी हैं। तेरह हलफ़नामे उनके द्वारा भारत की ग्यारह भाषाओं की लेखिकाओं की सशक्त कहानियों का अनूदित संग्रह है। उन्होंने वेनिस विश्वविद्यालय में एक कोर्स का अध्यापन किया। फ़्रांस, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन, नॉर्वे, मॉरिशस में अनेक बार पुस्तक मेलों और साहित्यिक सेमिनार में भारत का प्रतिनिधित्व किया। तीन उपन्यासों के इतालवी भाषा में प्रकाशित होने पर उन्हें इटली की सरकार द्वारा 'ऑर्डर ऑफ़ द स्टार ऑफ़ इटली- कैवेलियर' का सम्मान दिया गया।ई-मेल: alkasaraogi@gmail.comइतिहासकार और जीवनीकार प्रायः तथ्यों के मायाजाल में फंसे रहते हैं। कुशल कथाकार तथ्यों के पीछे छिपे सत्य के मर्म को उद्घाटित कर देते हैं। अलका सरावगी का 'गांधी और सरलादेवी चौधरानी' इसी का एक अप्रतिम उदाहरण है। ब्रह्मचर्य का व्रत ले चुके महामानव गांधी और असाधारण सौन्दर्य और प्रतिभा की धनी सरलादेवी चौधरानी के बीच पनपे झंझावाती आकर्षण का जैसा बारीक, मार्मिक और संयत वर्णन यहाँ हुआ है कहीं और नहीं मिलेगा। उपन्यास का अन्त विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह एक अद्भुत जुगत है उस सब की ओर इशारा कर देने की, जो मूल पाठ में पुरुष गांधी के विरुद्ध कहा जा सकता था, पर नहीं कहा गया; वह सब जो प्रेम की मर्यादा और आत्म-सम्मान ने सरलादेवी को और उनके सम्मान में कथाकार को कहने न दिया। - सुधीर चन्द्रा, प्रसिद्ध इतिहासकार और गांधी विशेषज्ञ

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us