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Inquilab Zindabad

by Gopi Chand Narang
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789357754132
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 316
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

यह वास्तविकता है कि उर्दू शायरी सामाजिक सरोकार से कटकर छुईमुई की तरह किसी काँच के घर में परवान नहीं चढ़ी। इसमें शुरू से सामाजिक, पारम्परिक और राष्ट्रीय संवेदना पायी जाती है (यद्यपि राष्ट्र की व्याख्याएँ बदलती रहती हैं)। उर्दू ने अपने लिए कभी भी युग और वातावरण से हटकर अलग रास्ता नहीं खोजा । देखा जाये तो उर्दू भाषा दो परम्पराओं, दो संस्कृतियों और दो भाषाओं का संगम है। यही कारण है कि इसमें दो सभ्यताओं की मिलीजुली गंगा-जमुनी बहार हमें धनक के रंगों की तरह दिखाई देती है। जैसा कि हम जानते हैं कि यह संगम भारत की धरती पर हुआ, इसलिए उर्दू भाषा का बुनियादी ढाँचा तो भारतीय ही है पर कहीं-कहीं इसमें विदेशी स्थान, सभ्यता और संस्कृति के जो लक्षण दिखाई देते हैं, इन्हें हम एक औपचारिकता मात्र ही मान सकते हैं।यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि मध्यकालीन भारत में देशभक्ति का अभिप्राय आज के युग की परिभाषा से अलग था। उस समयकाल में सांस्कृतिक एकता का भाव समाज में नहीं था। कारण था इतिहास और सभ्यता से जुड़ी विशेष परिस्थितियाँ। देशभक्ति की सामूहिक सोच बहुत बाद की बात है। उस समय की देशभक्ति हमारी दूसरी सामाजिक और सांस्कृतिक सोच की तरह निजी और व्यक्तिगत थी। इसकी बुनियाद सामूहिक एकता पर न होकर निजी और स्थानीय आधारों पर केन्द्रित होकर रह गयी थी, और इसकी अभिव्यक्ति भी स्थानीय और सीमित दायरों में कैद थी। उर्दू के उत्थान के इस आरम्भिक युग में प्राचीन और आधुनिक अवधारणाओं के बीच के फर्क को हमें ध्यान रखते हुए आगे बढ़ना होगा।-इसी पुस्तक से܀܀܀सन् सत्तावन का संग्राम भारतीय इतिहास की तरह उर्दू साहित्य में भी प्राचीन और आधुनिक के बीच एक सीमा तय करता है। इस संग्राम की असफलता से देश में पराजय की लहर में अंग्रेज़ों द्वारा किये गये जुल्म और बर्बरता ने भय के ऐसे वातावरण को पैदा किया जिसमें जी रहे एक आम आदमी ने अंग्रेज़ों से छुटकारा पाने को एक सपना समझकर सोचना ही छोड़ दिया था। इस संग्राम के बाद लगभग चौथाई शताब्दी तक भारत देश एक बेजान और आत्माहीन ज़िन्दगी बसर करता दिखाई पड़ता है। कुछ धार्मिक मार्गदर्शक और रूढ़िवादियों के अतिरिक्त अधिकतर ने सन् सत्तावन की विफलता को अन्तिम समझकर इस ऐतिहासिक और सामाजिक परिवर्तन से थक-हार कर समझौता करना शुरू कर दिया। ये परिवर्तन पीड़ादायक और अटल वास्तविकता थी और इसे रोक सकने का साहस किसी में नहीं था। इस परिवर्तन ने जहाँ एक तरफ़ समाज और साहित्य में पुरानी रीतियों का दमन कर दिया, वहीं नये विचारों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। लोगों के लिए सिवाय अपने को नये साँचे में ढालने के कोई विकल्प न बचा। जो लोग देश और समाज की पीड़ा समझते थे, उनके लिए भी आगे बढ़ने का मार्ग केवल यही था कि नयी सरकार से सुलह की जाये और अंग्रेज़ी शिक्षा और विज्ञान और मशीनी प्रगति और पश्चिमी मूल्यों को अपनाते हुए अपनी हालत को सुधारने के लिए अंग्रेज़ों से सहायता प्राप्त की जाये। यह परिस्थिति उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक बनी रही। देशभक्ति की भावना जो आज हमारे सामने है, यह बाद की पैदावार है।-इसी पुस्तक से

गोपी चन्द नारंगगोपी चन्द नारंग का शुमार उपमहाद्वीप के शीर्षस्थ उर्दू विद्वान एवं आलोचक के रूप में होता है। आपका जन्म 11 फ़रवरी 1931 को दुक्की, बलूचिस्तान (मौजूदा पाकिस्तान) में तथा 15 जून 2022 को अमेरिका के शहर शार्लेट में देहान्त हुआ। आपने ज़िन्दगी भर उर्दू भाषा की सेवा की। 1954 में उर्दू में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर तथा 1958 में डॉक्टरल शोध-कार्य पूरा किया। 1957 में सेंट स्टीफेंस कॉलेज में उर्दू साहित्य पढ़ाना शुरू किया और कुछ समय के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में आ गये जहाँ 1961 में रीडर के पद पर उन्नति हुई। आपने विस्कॉनसिन यूनिवर्सिटी, मिनेसोटा यूनिवर्सिटी, मिनिएपोलिस और ओस्लो यूनिवर्सिटी, नॉर्वे में बतौर विज़िटिंग प्रोफ़ेसर अध्यापन-कार्य किया। प्रो. नारंग ने 1974 में प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष के पद पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में पदभार ग्रहण किया और बारह वर्षों तक कार्य करने के पश्चात् 1986 में दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हुए और 1995 तक कार्यरत रहे। अपरिमित विद्वत्ता को ध्यान में रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय ने 2005 में और जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली ने 2012 में 'प्रोफ़ेसर एमेरिटस' से अलंकृत किया ।अध्यापन के अलावा प्रो. नारंग ने अनेक संस्थानों में दुर्लभ उत्साह और समर्पण के साथ शीर्ष भूमिकाएँ भी निभायीं जिनमें साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष फिर अध्यक्ष, दिल्ली उर्दू एकेडमी के उपाध्यक्ष, नेशनल काउंसिल फ़ॉर प्रोमोशन ऑफ़ उर्दू लैंग्वेज के उपाध्यक्ष शामिल हैं।प्रकाशित कृतियाँ : आपकी अंग्रेज़ी में 16 पुस्तकें, हिन्दी में 12 तथा उर्दू में लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हैं। इसके अतिरिक्त इन पर एम. फ़िल. एवं पीएच.डी. के कई शोध-कार्य तथा बेशुमार पत्रिकाओं के विशेषांक छप चुके हैं। आपकी कई पुस्तकों का हिन्दी, अंग्रेज़ी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।सम्मान एवं पुरस्कार : 'पद्म भूषण', 'पद्मश्री, 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार', 'ग़ालिब अवार्ड', 'इक़बाल सम्मान', 'बहादुर शाह ज़फ़र अवार्ड', 'सितारा-ए-इम्तियाज़' (पाकिस्तान), 'मेजिनी स्वर्ण पदक' (इटली), 'अमीर खुसरो पुरस्कार' (शिकागो), 'आलमी फ़रोग-ए-उर्दू अदब अवार्ड' (दोहा-क़तर) इत्यादि ।/अय्यूब ख़ाँअय्यूब ख़ाँ पेशे से इंजीनियर हैं। दस साल तक अलग-अलग कंपनियों में कार्यरत रहने के साथ बतौर फ्रीलांसर आकाशवाणी, दिल्ली से जुड़े और पूर्णतः समर्पित हो गये। एफ़.एम. चैनल के भारत में शुरू होने के समय से ही उससे जुड़े और लगभग बीस सालों में हज़ार से ऊपर कार्यक्रम किये। फिर इसके अलावा रंगमंच पर लगभग आठ साल जुड़े रहने के दौरान टॉम अल्टर जैसे दिग्गज कलाकार के साथ सौ के आसपास परफ़ॉर्मेंस ।

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