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Itihas Darshan

by Ramvilas Sharma
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170553717
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 410
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 600 grams
  • BISAC Subject(s): Asia / South / General

भारत के सन्दर्भ में साम्राज्यवाद का अध्ययन ख़ासतौर से आवश्यक था। राहुल जी में उसका अभाव है, इसलिए साम्राज्यविरोधी क्रान्ति के बिना वह भारत में समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न देखते हैं। मार्क्सवाद में जातीय समस्या का विस्तृत विवेचन है। उससे लाभ उठाकर राहुल जी भारत की जातीय समस्या को समझने का प्रयत्न नहीं करते। वह पाकिस्तान के सवाल पर धर्म को भाषा और संस्कृति से ऊपर रखते हैं, भारत की जातीय संस्कृतियों को वह हिन्दू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति इन दो भागों में बाँट देते हैं। सभी जातियों की एकता जनवादी क्रान्ति के लिए आवश्यक है, यह धारणा उनकी आँखों से ओझल रहती है।दर्शन का इतिहास वह यूनान से आरम्भ करते हैं। भारत के दर्शन को वह धर्म से सम्बद्ध करते हैं; यूरुप दर्शन को उससे मुक्त रखते हैं। भारतीय दर्शन को वह नवीं सदी से समाप्त कर देते हैं; यूरुप का दर्शन वह बीसवीं सदी तक ले आते हैं। यूरुप से जो सबसे घटिया बात उन्होंने सीखी है, वह शुद्ध रक्त और शुद्ध वर्ण का सिद्धान्त है। उनकी कल्पना में यूरुपवालों ने भारत को दो बार जीता-एक बार वैदिक आर्यों के आक्रमण के समय, दूसरी बार अंग्रेज़ों के आक्रमण के समय । दूसरे आक्रमण की अपेक्षा वह पहलेवाले पर ध्यान ज़्यादा केन्द्रित करते हैं।जनवादी क्रान्ति को वह पार्श्वभूमि में ठेल देते हैं; केन्द्रभूमि में ले आते हैं सांस्कृतिक क्रान्ति को । इस क्रान्ति में वह ईश्वरवाद के खण्डन को बहुत महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस सम्बन्ध में उन्होंने मार्क्स के लेखन का अध्ययन नहीं किया। एंगेल्स ने ईसाइयत के अभ्युदय काल के बारे में लिखा था : “प्रारम्भिक ईसाइयों और सोशलिस्टों में यह बात सामान्य है कि जिस दुनिया से वे लड़ने चले हैं, वह शुरू में उनसे अधिक शक्तिशाली है, इसके साथ ही वह नये पन्थ पर चलने वालों के विरुद्ध भी है। इन दो महान् आन्दोलनों में से कोई भी नेताओं या भविष्यवक्ताओं द्वारा निर्मित न हुआ था-यद्यपि उनमें भविष्यवक्ताओं की कमी नहीं है; वे जन-आन्दोलन थे।" ईसाइयतवाले जन-आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता ईश्वरवादी थे। ईश्वर में विश्वास करने से ही मनुष्य प्रतिक्रियावादी नहीं हो जाता। जाकी रही भावना जैसी, इस भावना को देखना चाहिए। सामन्तों और पुरोहितों की भावना तथा किसानों और कारीगरों की भावना में फ़र्क़ होता है। धर्म को उसके ऐतिहासिक विकास-क्रम में देखना चाहिए । राहुल जी ने ईश्वरवाद का जो विरोध किया है, वह जनता को शिक्षित करने वाला नहीं, उसे मार्क्सवाद से दूर ले जाने वाला है।

रामविलास शर्मा -10 अक्टूबर, 1912 को ज़िला उन्नाव के ऊँचगाँव सानी में जन्म । लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 में बी.ए. और 1935 - में अंग्रेज़ी साहित्य से एम.ए.। 1938 से 1943 तक लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी अध्यापक। 1943 से 1971 तक बलवन्त राजपूत कॉलेज, आगरा में अध्यापन। 1974 तक के.एम. हिन्दी संस्थान के निदेशक रहने के बाद अवकाश ग्रहण ।देशभक्ति तथा मार्क्सवादी चेतना रामविलास जी की आलोचना का केन्द्र-बिन्दु है। उनकी लेखनी से वाल्मीकि तथा कालीदास से लेकर मुक्तिबोध तक की रचनाओं का मूल्यांकन प्रगतिवादी चेतना के आधार पर हुआ। उन्हें न केवल प्रगति-विरोधी हिन्दी आलोचना की कला एवं साहित्य-विषयक भ्रान्तियों के निवारण का श्रेय है, वरन् स्वयं प्रगतिवादी आलोचना द्वारा उत्पन्न अन्तर्विरोधों के उन्मूलन का गौरव भी प्राप्त है ।रामविलास जी को निराला की साहित्य साधना पुस्तक पर 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त वे 1988 में 'श्लाका सम्मान', 1990 में 'भारत भारती पुरस्कार', 1991 में 'व्यास सम्मान' और 2000 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 'शताब्दी सम्मान' से सम्मानित । इन पुरस्कारों की राशि को देश में सारक्षरता के प्रसार के लिए दान ।30 मई 2000 को निधन ।

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