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Jai Siyaram Evam Anya Kathayen

by Dhirendra Singh Jafa
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789350004746
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 136
  • Original Price: INR 95.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

धीरेन्द्र सिंह जफ़ा की अपनी जीवन-यात्रा की तरह उनकी ये कहानियाँ भी बहुआयामी हैं। इन कहानियों में वे किसी एक विषय-वस्तु पर केन्द्रित नहीं रहे हैं। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, पारिवारिक और नैतिक प्रसंगों को फोकस करते हुए कहानियों में उनकी अर्थवत्ता को उजागर किया है। किसी एक अनुभव- बिन्दु से आरम्भ होकर उनकी कहानियाँ लगातार एक बृहत्तर अनुभव-संसार की ओर अग्रसर होती जाती हैं और इस प्रक्रिया में हमारे समय के असली रूप रंगों को भी उभारते जाते हैं ।'जय सियाराम' कहानी में यह दिखाया गया है कि एक धार्मिक प्रसंग किस प्रकार कुछ बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों के बीच बहस का मुद्दा बनता है और ये लोग अपने स्वार्थ-साधन के लिए किस प्रकार उसका उपयोग करते हैं। कथाकार 'जय सियाराम' और 'जय श्रीराम' के अभिप्रायों के बीच के बारीक फ़र्क़ को रेखांकित करते हुए संकीर्ण मानसिकता की ओर भी संकेत करता है। इस तरह के और भी बहुत-से संक्रमण -बिन्दुओं को दूसरी कहानियों का विषय बनाया गया है। लेखक ने जीवन की यात्रा में आगे बढ़ते हुए इन कहानियों के पात्रों को नैतिकता और इनसानियत की कसौटी पर परखा है न उनके चरित्र को घटाकार और न ही उन्हें अतिरंजित करके ।लेखक ने संग्रह में शामिल रचनाओं को 'कहानी' न कहकर 'कथा' कहा है। ये कहानियाँ चाहे छोटी हों या लम्बी, इनमें एक दीर्घता जरूर है। ठहराव जरूर है और यह दीर्घता कहानी के समाप्त हो जाने के बाद भी उसके प्रभाव की दीर्घता है जो लम्बे समय तक पाठकों के मन-मस्तिष्क पर छायी रहती है।

धीरेन्द्र सिंह जफ़ासन् 1935 में उत्तर प्रदेश में जन्मे धीरेन्द्र सिंह जफ़ा ने वायुसेना में फ़ाइटर पायलट के रूप में भारत-पाक युद्धों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। 1971 के युद्ध में वीरता के लिए उन्हें 'वीर चक्र' से अलंकृत किया गया। फ़ाइटर पायलट्स के युद्ध के अनुभवों एवं क्रिया-कलापों को उन्होंने अपनी पुस्तक 'मृत्यु कष्टदायी न थी' में लेख-बद्ध किया जो अपने आप में युवाओं के लिए देश-सेवा की भावनाओं का अद्भुत प्रेरणा-स्रोत है। अवकाश-प्राप्ति के बाद फ़ैज़ाबाद में निवास करते हुए ‘सियाराम' में उनकी आस्था विकसित हुई। 4 जनवरी 1984 के रामलला प्रकटोत्सव समारोह का संचालन अयोध्यावासियों ने उन्हें सौंपा था। उनके नेतृत्व में पहली बार विवादित ढाँचे के बीच वाले बुर्ज़ पर हनुमान पताका फहराई गयी। इसके अलावा गर्भगृह में पहली बार हवन किया गया जिसमें अयोध्या के सारे प्रमुख सन्त- महन्त उपस्थित थे। इन दो कार्यों की ख़बर जंगल में आग जैसी फैली और एक अभूतपूर्व जन-सैलाब उस दिन की शोभा यात्रा में उमड़कर सामने आया। इससे प्रेरणा लेकर अन्य हिन्दू संगठन रामलला की मुक्ति के लिए मैदान में आये। अपने सामाजिक जीवन में सन् 1989 के अयोध्या-फैजाबाद के साम्प्रदायिक तनाव में अमन-चैन की दिशा में उनके प्रयासों को भारत के उप-राष्ट्रपति द्वारा सराहा गया एवं उन्हें 'समाज रत्न' की उपाधि से सुशोभित किया गया।

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