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Jan Jan Ke Kavi Tulsidas

by Dr. Yogendra Pratap Singh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181439833
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 112
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

जन जन के कवि तुलसीदास - कविता की कालजयता का अर्थ भी यही है कि वाणी तथा अर्थ की सम्पक्ति की कोई अन्तिम व्याख्या नहीं है, फिर भी, जितनी और जहाँ तक उसकी व्याख्याएँ की जाती है, उसके प्रति किसी के मन में अस्वीकृति का भाव भी नहीं उत्पन्न होता। गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों का सन्दर्भ कुछ ऐसा ही है और परम्परा की श्रेष्ठ, कालजयी कृतियाँ भी इसी क्रम में देखी जा सकती हैं। सृजनधर्मी तत्त्वों के साथ कविता का पाठ स्वयं में अर्थ की विलक्षणता उत्पन्न करता चलता है और सच पूछें तो इसका उत्तर भी यही है कि कृति के अर्थ की रहस्यमयता पाठ के आवरण में छिपी रहती है। तुलसीदास की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति श्रीरामचरितमानस पाठ अर्थ की जिन सतहों का निर्माण करता हुआ, चित्त को विविध अर्थों की तरंगमयता का बोध कराता है, उनकी जितनी व्याख्याएँ की जायें, थोड़ी हैं। आज भी श्रीरामचरितमानस का पाठ जितना स्पष्ट तथा साफ़ दिखाई पड़ता है, उतना ही वह रहस्यमय बना हुआ है-और जैसा कि कहा जा चुका है, भाव को निर्मित की ज्ञानात्मक व्याख्याएँ सदैव अधूरी ही रहती है।आज का युग भौतिक आपा-धापी का एक विचित्र उदाहरण बनता जा रहा है। हमारी कालजयी कृतियाँ जन-मानस को आगाह करती हैं कि इस सृष्टि के जीवित प्राणियों से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है, मनुष्य जाति सर्वोपरि है और उन सबकी रक्षा करना हम सबका प्रथम दायित्व है। भारतीय संस्कृति ने अपनी ऊर्जा द्वारा इस तत्त्व की सुरक्षा के जो उपाय निर्दिष्ट किये हैं, श्रीरामचरितमानस में तुलसी उन्हें अपनी कविता का विषय बना कर हमारे मानस में स्थापित करते हैं। इस पुस्तक का मन्तव्य तुलसी की प्रमुख कृतियों में निहित उन्हीं भारतीय सन्दर्भों की व्याख्या करना है, जिनके कारण मानव जाति की आत्यन्तिक सुरक्षा हो सके।

योगेन्द्र प्रताप सिंह - पूर्व प्रोफ़ेसर और अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय।पूर्व निदेशक - पत्राचार पाठ्यक्रम संस्थान, इलाहाबाद विश्वविद्यालय।पूर्व अध्यक्ष: हिन्दुस्तानी एकेडमी।आलोचनात्मक साहित्य: हिन्दी वैष्णव भक्ति काव्य में निहित काव्यादर्श और काव्य शास्त्रीय सिद्धान्त; लीला और भक्ति रस; भारतीय काव्यशास्त्र भारतीय काव्यशास्त्र की रुपरेखा; काव्यांग परिचय; सर्जन और रसास्वादन; भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र और हिन्दी आलोचना; भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र का तुलनात्मक अनुशीलन; इतिहास दर्शन और साहित्येतिहास की समस्याएँ।कबीर की कविता; कबीर, सूर, तुलसी, मानस के रचना शिल्प का विश्लेषण; तुलसी के रचना वैविध्य का विवेचन; तुलसी के रचना सामर्थ्य का विवेचन; आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-निबन्ध संरचना और सैद्धान्तिक चिन्तन। सर्जनात्मक साहित्य: बनते गाँव टूटते रिश्ते; देवकी का आठवाँ बेटा; अन्धी गली की रोशनी; गो. तुलसीदास की जीवन गाथा (उपन्यास)। गीति अर्द्धशती; बीती शती के नाम; उर्वशी; गाधि पुत्र; सागर गाथा तथा अन्य कविताएँ।सम्पादन तथा टीका- भक्तिकाल : गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस सम्पूर्ण; विनय पत्रिका; कवितावली; बालकाण्ड; अयोध्याकाण्ड; सुन्दरकाण्ड; लंकाकाण्ड; उत्तरकाण्ड (पृथक-पृथक भूमिका लेखन तथा सम्पादन)।रीतिकाल: करुणाभरण नाटक (लच्छीराम कृत); जोरावर प्रकाश (सूरति मिश्र, रसिकप्रिया की टीका); कृष्णचन्द्रिका (वीर कवि कृत)।संयुक्त लेखन: हिन्दी साहित्य कोश - भाग 1 तथा 2।

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