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JanKavi

by Ed. by Vijay Bahadur Singh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350727126
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 368
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 550 grams
  • BISAC Subject(s): General

जनकवि - अभी हमारे निकट अतीत के युग में हिन्दी गद्य में जो काम प्रेमचन्द ने किया वही काम कविता के क्षेत्र में नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल और मुक्तिबोध ने किया। प्रगतिशील काव्य-आन्दोलन जब भी पहचाना जायेगा और उसको अपना श्रेय मिलेगा, उसका आधार उसके सैद्धान्तिक और वैचारिक पक्ष कम, उस जीवन दर्शन की उत्कृष्ट सृजनात्मक परिणतियाँ बनेंगी जो रचनाओं के रूप में प्रकट हुई। विजय बहादुर सिंह के इस संकलन का सबसे पहला महत्त्व यही है कि इस पुस्तक के माध्यम से वे एक पूरे युग, एक सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि, एक समग्र विचारधारा और एक परस्पर-सम्पूरक सृजनशीलता को एक साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। नागार्जुन की कविता की सचेत फक्कड़ता का कबीर वाला बाना, त्रिलोचन की अन्तरंग और कला-साध्य सहजता, केदार की रचनाओं का लोक-सौन्दर्य और किसान-संवेदना, शमशेर की अप्रतिम और ख़ास 'शमशेरियत' तथा मुक्तिबोध की संवेदना और विवेक का गहन तनावग्रस्त अँधेरा और आत्मद्वन्द्व यहाँ एक साथ संयोजित हैं।"हम लेखक हैं, कथाकार हैं,हम जीवन के भाष्यकार हैं, चंद, सूर, तुलसी, कबीर केसन्तों के, हरिचन्द वीर के हम वंशज बड़भागी। हम हैं मानवतावादी हम कवि हैं जनवादी।अपने युग के विराट और व्यापक जन-जीवन की सृजनात्मक व्याख्याएँ करती 'कर्मवाची' शब्दों से लिखी गयी इस कविता के अनेक रंग इस संग्रह में पाठकों को मिलेंगे, इसमें सन्देह नहीं।-उदय प्रकाशपिछले बरसों में हमारी धारा को तलाशने वाले जितने भी संकलन हुए हैं तक़रीबन तार सप्तक के बाद उसमें जन-कवि निश्चित ही एक बहुत महत्त्वपूर्ण और उत्तेजक संग्रह है।-राजेश जोशी

विजय बहादुर सिंह - 16 फ़रवरी, 1940 को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद - अब अम्बेडकर नगर के एक गाँव जयमलपुर में जन्मे विजय बहादुर सिंह ने अध्यापन कार्य के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियों की सृष्टि कर सर्वभारतीय प्रतिष्ठा प्राप्त की है। उनके स्वतन्त्र आलोचनात्मक ग्रन्थ हैं- 'बृहत्त्रयी' (प्रसाद, निराला, पन्त की कविता पर एकाग्र), 'नागार्जुन का रचना-संसार', 'नागार्जुन संवाद, 'कविता और संवेदना', 'उपन्यास समय और संवेदना', 'आलोचक का स्वदेश' (आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की साहित्यिक जीवनी)।आठ खण्डों में 'भवानीप्रसाद मिश्र ग्रन्थावली', चार खण्डों में 'दुष्यन्त कुमार ग्रन्थावली', आठ खण्डों में 'नन्ददुलारे वाजपेयी ग्रन्थावली' के सम्पादन-कार्य के अलावा उन्होंने 'जन-कवि' नाम से प्रगतिशील कवियों केदारनाथ - अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और मुक्तिबोध की कविताओं का सम्पादन किया है।आलोचना की दुरूह बौद्धिकता से सम्बद्ध रहते हुए भी कविता के भावमय जगत् में प्रवेश करने में विजय बहादुर सिंह को कोई कठिनाई नहीं हुई। 'मौसम की चिट्ठी', 'पतझर की बाँसुरी', 'पृथ्वी का प्रेमगीत' (तीन कवियों का संयुक्त संकलन), लम्बी आख्यानक कविता "भीम बैठका" और 'शब्द जिन्हें भूल गयी भाषा' उनकी काव्य कृतियों हैं। 'आज़ादी के बाद के लोग' और 'आओ खोजें एक गुरु' उनकी समाज और शिक्षा से जुड़ी कृतियाँ हैं।

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