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Jis Lahore Nai Dekhya O Jamyai Nai

by Asghar Wajahat
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789350003138
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 82
  • Original Price: INR 95.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): General

जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ : वजाहत ने कथावस्तु को नाटकीय और मानवीय स्वरूप प्रदान किया है। वे धर्म का नितान्त विरोध नहीं करते बल्कि यह' बताते हैं कि समाजविरोधी तत्त्व किस तरह धर्म से फ़ायदा उठाते हैं। पात्रों का विकास तार्किक है तथा नाटक में पंजाब और लखनऊ की संस्कृतियों का मानवीय स्तर पर समागम अत्यन्त संवेदनशील है। बुद्धिजीवियों और साधारण जनता के बीच का जो सम्बन्ध होना चाहिए वह नाटककार ने मौलवी, कवि और जनसाधारण का प्रतिनिधित्व करने वाले पात्रों के माध्यम से उभारा है। मस्जिद में मौलवी की हत्या एक प्रतीक है जिसके माध्यम से स्वार्थी तत्त्वों द्वारा धर्म तथा जीवन के महान मूल्यों को नष्ट कर देने की बात कही गयी है।- टाइम्स ऑफ इंडिया 5 अक्टूबर 1990★★★असग़र वजाहत का सम्बन्ध उस पंजाब से नहीं है जिसने विभाजन के दर्द को झेला है और न वे निजी रूप में उस युग के साक्षी रहे हैं लेकिन उन्होंने उस विभाजन के उस युग पर कलात्मक ढंग से लिखा है।... असग़र ने 'जिस लाहौर नइ देख्या...' नाटक को केवल मानवीय त्रासदी तक सीमित नहीं किया है बल्कि दोनों समुदायों के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास किया है। इस प्रयास का उद्देश्य यह बताता है कि दोनों समुदायों के बीच क्या हुआ कि सांस्कृतिक एकता, मोहल्लेदारी, प्रेम, विश्वास और भाईचारा समाप्त हो गया था...- हिन्दुस्तान टाइम्स सितम्बर 1996★★★उन लोगों के सामने सिर झुकाना चाहिए जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता पर केंद्रित नाटक में भाग लिया और विभाजन के तैंतालीस साल के बाद एक बार फिर नाटक में चित्रित यह युग हमारे सामने आया।-स्टार, कराची जुलाई 1991★★★इस देश में आज जिस चीज़ की सबसे ज्यादा जरूरत है वह सहिष्णुता है जिसका अभाव हमारी नैतिक और सामाजिक बुनियादों को खोखला कर रहा है। इस संदर्भ में 'तहरीके निस्वां' थियेटर ग्रुप द्वारा हाल ही में प्रस्तुत नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या...' बहुत प्रासंगिक था।-डॉन, कराची जुलाई 1991★★★नाटक का नया पक्ष जो लेखक को अन्य प्रगतिशील लेखकों से अलग करता है वह यह है कि उसमें मौलवी को संकुचित विचारों वाला दकियानूसी आदमी नहीं चित्रित किया है। असग़र वजाहत का मौलवी खलनायक नहीं है । वह हर तरह से मानवीय है। क्या यह सेंसर बोर्ड (कराची, पाकिस्तान) को नाटक प्रस्तुत करने की अनुमति देने का आधार नहीं लगा ?- हेराल्ड, कराची जुलाई 1991

असग़र वजाहतहिन्दी के प्रतिष्ठित लेखक असगर वजाहत के अब तक सात उपन्यास, छह नाटक, पाँच कथा संग्रह, एक नुक्कड़ नाटक संग्रह और एक आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित हैं। उपन्यासों तथा नाटकों के अतिरिक्त उन्होंने महत्त्वपूर्ण यात्रा संस्मरण भी लिखे हैं। ईरान और अज़रबाइजान की यात्रा पर आधारित उनका यात्रा संस्मरण चलते तो अच्छा था चर्चा में रहा है।वर्ष 2007 में हिन्दी पत्रिका आउटलुक के एक सर्वेक्षण के अनुसार उन्हें हिन्दी के दस श्रेष्ठ लेखकों में शुमार किया गया था। उनकी कृतियों के अनुवाद अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, रूसी, हंगेरियन, फ़ारसी आदि भाषाओं में हो चुके हैं।उन्होंने वी. वी. हिन्दी डॉट कॉम तथा 'हंस' जैसी पत्रिकाओं के लिए अतिथि सम्पादन किया है। उनके लेख हिन्दी के महत्त्वपूर्ण समाचारपत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं।श्रेष्ठ लेखन के अतिरिक्त उनकी गहरी रुचि चित्रकला तथा फ़ोटोग्राफ़ी में भी है। उनकी दो एकल प्रदर्शनियाँ वुदापैश्त, हंगरी और दिल्ली में हो चुकी हैं। उनके चित्र पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।असगर वजाहत लम्बे समय से फ़िल्मों के लिए पटकथाएँ लिख रहे हैं। उन्होंने 1976 में मुज़फ्फर अली की फ़िल्म 'गमन', उसके बाद 'आगमन' तथा अन्य फ़िल्में लिखी हैं। आजकल वे विख्यात निर्देशक राजकुमार संतोषी के लिए पटकथा लिख रहे हैं जो उनके नाटक जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ पर आधारित है। वे पटकथा लेखन कार्यशालाएँ भी आयोजित करते रहते हैं।अन्य सम्मानों के अतिरिक्त असगर वजाहत को उनके उपन्यास कैसी आगी लगाई के लिए कथा यू.के. द्वारा हाउस ऑफ़ लाईस लन्दन में सम्मानित किया जा चुका है। असगर वजाहत, जामिया मिल्लिया इस्लामिया (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) नयी दिल्ली के हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त वे बुदापश्त, हंगरी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रह चुके हैं। उन्होंने ए. जे. मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर के कार्यकारी निदेशक के रूप में भी काम किया है।

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