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ज्ञानयोग (Gyanyog)

by स्वामी विवेकानन्द (Swami Vivekananda)
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788121260633
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Gyan Publishing House
  • Publisher Imprint: Gyan Publishing House
  • Publication Date:
  • Pages: 245
  • Original Price: INR 180.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 428 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

किताब के बारे में प्रस्तुत पुस्तक ज्ञानयोग में दर्शाया गया है कि वैयक्तिक एवं सामुदायिक जीवन गठन में वेदान्त किस तरह सहायक होता है। मनुष्य के विचारों का उच्चतम स्तर वेदांत ही है। सांसारिक सभी विचार धाराओं का मूल स्रोत वेदांत ही है। वेदांत में मनुष्य का दैवी स्वरूप झलकता है तथा इसमें समस्त विश्व की आशा, कल्याण तथा शांति निहित है। अद्वैत वेदांत की धारणा अत्यंत कठिन है। यही ब्रह्म जगत बन जाता है देश, काल, निमित्त से वह अद्वैत हो जाता है। देश, काल, निमित्त रूपी कांच से जब हम ब्रह्म को देखते हैं तो वह जगत रूप में दिखाई देता है। वेदान्तानुसार ज्ञान योग में यही कहा गया है कि ‘‘स्वर्ग का राज्य तुम्हारे भीतर हैं’’ सिर्फ देखने-सुनने की जरूरत है। ज्ञान योग का सारांश है कि तुम्हीं समस्त जगत हो किससे घृणा करोंगे, किससे प्यार करोगे जो इस तत्व को जान गया वही ज्ञान योगी है वह अपना समस्त जीवन उसी के द्वारा गठित करता है तथा अंधकार उससे कोसों दूर रहता है।

लेखक के बारे में -ः स्वामी विवेकानन्द ;1863-1902 वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें 2 मिनट का समय दिया गया था लेकिन उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत ‘मेरे अमेरिकी बहनों एवं भाइयों’ के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था। कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में जन्मे विवेकानन्द आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे। जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीवों मे स्वयं परमात्मा का ही अस्तित्व हैं। इसलिए मानव जाति अर्थात जो मनुष्य दूसरे जरूरतमन्दों की मदद करता है इस सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानन्द ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रस्थान किया। विवेकानन्द ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धान्तों का प्रसार किया और कई सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में विवेकानन्द को एक देशभक्त सन्यासी के रूप में माना जाता है और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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