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Kaatar Bela

by Devesh Thakur
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181432711
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 132
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

कातर बेला - व्यक्ति भले ही कितना भी यथार्थवादी और वस्तुपरक हो, संयोग भी उसके जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कभी-कभी इन संयोगों से पार पाना सम्भव नहीं हो पाता। 'कातर बेला' भी संयोगों से आपूरित ऐसी कथा है जो बार-बार व्यक्तिपरक जटिलताओं में उलझती हुई आगे बढ़ती है और व्यक्ति चरित्रों को उघाड़ती हुई एक अत्यन्त कातर-बिन्दु पर समाप्त हो जाती है।इस कथा के सभी पात्र संयोगों की जटिलता से पीड़ित हैं। चाहे वह कथा नायिका सोनल हो, कथा नायक अमर हो, रूपल हो, राय बहादुर मेहता हों, काजल हो या दिलशाद खांडवाला ही क्यों न हो। सभी पात्र अपने-अपने अन्तर्द्वन्द्वों को लेकर जीते हैं और किसी न किसी स्तर पर परस्पर जुड़कर एक दूसरी की पीड़ा के कारक भी बन जाते हैं।'कातर बेला' मूलतः स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की कहानी है। लेकिन अन्तर्धारा के रूप में यह जीवन और समाज के सरोकारों से भी अछूती नहीं है। इसमें संक्षेप में ही सही, राजनीतिक चर्चा का स्पर्श है, शिक्षा-संस्थाओं की दयनीय दशा पर कटाक्ष हैं और साथ ही निम्नमध्य वर्गीय जीवन की विवशताओं का उद्घाटन भी है। फिर भी मूल रूप से यह एक अकेली, बढ़ती उम्र की सम्पन्न नारी और एक अभावग्रस्त, सामान्य रूप से मध्यवर्गीय युवक के परस्पर परिचय और प्रणय की व्यथा-कथा ही है जो संयोग से परिस्थितिवश एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं और अन्ततः बिखर जाते हैं।पूरी कथा सहज रूप से व्यक्ति मन की गाँठों को खोलते हुए विकसित होती है और अन्त में आकस्मिक रूप से एक वेदना बिन्दु पर पर्यवसित हो जाती है।कथाकार देवेश ठाकुर द्वारा अत्यन्त आत्मीय और प्रयोगात्मक में बुनी गयी एक और कथा-कातर बेला।

देवेश ठाकुर - जन्म : 23 जुलाई, 1933; पैठानी (ज़िला अल्मोड़ा, उत्तरांचल) में।शिक्षा तथा अध्यापन पीएच.डी., डी.लिट्. (हिन्दी); 1956 से 1959 तक मुम्बई विश्वविद्यालय से सन्बद्ध सिडनहॅम कॉलेज तथा 1960 से रामनारायण रुइया कॉलेज में प्राध्यापक; 1993 में कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद से अवकाश ग्रहण।कृतियाँ : पचास से अधिक रचित सम्पादित, अनूदित कृतियाँ प्रकाशित 'कथा-क्रम' (दो खण्डों में सम्पादित), भ्रम-भंग, काँचघर, जनगाथा, गुरुकुल, शिखर-पुरुष, शून्य से शिखर तक, अन्ततः (उपन्यास); साहित्य के मूल्य, साहित्य की सामाजिक भूमिका, 'नदी के द्वीप' की रचना प्रक्रिया, 'मैला आंचल' की रचना-प्रक्रिया, नयी कविता के सात अध्याय (समीक्षा) ; 'प्रसाद' के नारी-चरित्र, आधुनिक हिन्दी साहित्य की मानवतावादी भूमिका, हिन्दी साहित्य तथा साहित्येतिहास अन्तरानुशासनों का अनुशीलन (शोध) ; आज़ादी की आधी सदी और आम आदमी (तीन खण्ड- राष्ट्रीय इतिहास और समाज (सह लेखन) विशेष रूप से चर्चित।रचनावली : देवेश ठाकुर रचनावली (चुने हुए 24 ग्रन्थों का संकलन, सात खण्ड) 1992 में प्रकाशित।रचनाधर्मिता पर शोध तथा आलोचना :विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा देवेश ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अब तक 12 शोधार्थियों को पीएच.डी. तथा 14 विद्यार्थियों को एम.फिल्. की उपाधि प्रदत्त साथ ही, उन पर सात स्वतन्त्र समीक्षा पुस्तकों का प्रकाशन। 'कथा-शिल्पी देवेश ठाकुर', 'देवेश ठाकुर : प्रश्नों के घेरे में', 'पाण्डुलिपि' तथा 'अल्प-विराम' विशेष रूप से उल्लेखनीय।

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