Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Kachhar-Katha

by Harish Chandra Pandey
Save 30% Save 30%
Current price ₹139.00
Original price ₹199.00
Original price ₹199.00
Original price ₹199.00
(-30%)
₹139.00
Current price ₹139.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789395737630
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 128
  • Original Price: INR 199.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

कुछ ही कवि चेतना की चोट से अब तक की परिभाषाओं को धीरे-धीरे ढहाकर अपनी कविता का परिसर निर्मित कर पाते हैं। हिन्दी के हरीश चन्द्र पाण्डे उनमें से एक हैं। उनमें सायास लिखने की न तो बहुत उठाबैठक है, न अनायास लिखने का क्रीड़ा-विलास और निष्प्रयोजनीयता। बल्कि उनकी कविता की चौहद्दी से बाहर भी संवेदना की बहुत सारी हरी-हरी दूब मुलमुलाकर झाँकती मिलती है।

‘गले को ज्योति मिलना’ से लगायत ‘फूल को खिलते हुए सुनना’ जैसे तमाम प्रयोग हरीश चन्द्र पाण्डे के काव्य-संसार में पारम्परिक इन्द्रियबोध को धता बताकर सर्वथा नई तरह की अनुभूति का अहसास कराने में सक्षम हैं। आभासी दृश्यों के घटाटोप को भेदती हुई उनकी कविताएँ उन अनगिन आवाज़ों को ठहरकर सुनने का प्रस्ताव करती हैं जिनमें एतराज़, चीत्कार, हँसी और ललकार के अनेक कंठ ध्वनित होते हैं और ‘हर आवाज़ चाहती है कि उसे ग़ौर से सुना जाए’। क्योंकि हमारी दुनिया ‘अँधेरे के टापू’ में तब्दील होती जा रही है और भयावह अँधेरे को बेकाबू हाथी के अक्स में ढालती जा रही है।

कोई देखे या न देखे लेकिन एक ‘सूर गायक’ इसे यहाँ अपनी प्रज्ञाचक्षु से देख भी रहा है और उसे अपनी आवाज़ भी दे रहा है—एक ऐसी आवाज़ जिससे लोकगीत कहते हैं कि हमें अपना कंठ दें दो और निर्गुण कहते हैं कि हमें। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ ऐसी ही आवाज़ों की सम्पुंज हैं जो बादल छँटने की आवाज़ भी सुन सकती हैं जो एकदम बेआवाज़ हैं। यहाँ हमारे समय की वे बर्बरताएँ भी दर्ज हैं जहाँ कॉलेज जातीं, खुसुरफुसुर करतीं, चहचहातीं, पढ़ाई-लिखाई के दबाव झेलतीं और किशोरवय को सेलीब्रेट करतीं लड़कियों के आसपास ही कोई लड़का घात लगाए केमिस्ट की दुकान से एसिड की बोतल ख़रीद रहा है।

इस ब्रोकर समय में ज़मीन से आसमान तक बेच देने की हवस जिस तरह मनुष्यता के लिए ख़तरे की घंटी है, उसे कवि की उठी हुई तर्जनी सधे ढंग से लक्ष्य करती है। इसीलिए अपने नतोन्नत पहाड़ों पर खिलते बुरूंश के फूलों से लेकर गंगा-जमुना के अवतल कछारों तक पसरी हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ अपनी सौन्दर्यदृष्टि, प्रतिरोधी चेतना, भावाभिव्यक्ति और इन्द्रियबोध से कविता की तथाकथित मुख्यधारा से अलग उद्गम और सरणी निर्मित करती हैं। उनका प्रस्तावित नया संग्रह 'कछार-कथा' कोई मील का पत्थर नहीं बल्कि कवि के काव्य-परिसर को और आगे तक देखने का आमंत्रण है।    —अष्टभुजा शुक्ल

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us