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Kadambari-2

by Vijay Tendulkar
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181438782
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 264
  • Original Price: INR 350.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 350 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

विजय तेंडुलकर का उपन्यास 'कादम्बरी-दो' आज के राजनीतिज्ञों में छिपे कूट राजनीतिज्ञों की टेढ़ी चालों में, स्वार्थी दायरों में, दमघोंटू स्थितियों के दौर से गुज़रनेवाले एक शहर की त्रासदियों की कहानी है जो शहर हमें किसी भी शहर में बड़ी आसानी से देखने को मिलता है। दूसरी ओर यह कहानी भेड़िया धँसान प्रवृत्ति की आदी बने उन नगरवासियों की भी है जो किसी भी नगरवासियों की कहानी हो सकती है । चूहों का धीरे-धीरे इतना ढीठ बनना कि मनुष्य की तरह अकड़कर चलना; उनकी दहशत में जीने के लिए मजबूर शहरवासियों का धीरे-धीरे चूहों जैसा कायर, दब्बू बनना, नगरपाल जैसे शहर रक्षक, जनता रक्षक का अपनी कुर्सी बनाए रखने के लिए इन दहशतवादी चूहों को पालना... और एक उत्क्रांति के दौरान (?) आदमकद चूहा बन जाना; अपने इस विद्रुप को भी 'कैश' करने के प्लॉन बनाना आज की राजनीति का वह भयावह, छिपा और खुलने पर बीभत्सदी का चेहरा है जिसके दोहरे-तीहरे शोषण में आम आदमी जीने को बाध्य किया जा रहा है। कभी-कभार यह आम आदमी उन मुस्कैंडे चूहों के अमानुष बलात्कार, पुलिस प्रमुख की खूँखार साजिशें, नगरपाल, नगरसेवकों के घिन आनेतक के स्वार्थी, निर्दयी राजनैतिक दाँवपेंच, जनता के खून चूसने के 'जोंक-तरीके' इनके प्रतिकार में साहस जुटाना भी है तो उसे किस तरह किसम-किसम से इमोशनल ब्लैकमेल किया जाता है इसकी मन विदीर्ण करने वाली यह यथार्थ कहानी प्रतीकात्मकता, रूपकात्मक और फैन्टसी के आश्रय में कुछ इस कदर उद्घाटित हो जाती है कि इस देश की राजनीति के अतीत, वर्तमान, भविष्य के कैनवास एवं संघर्ष पाठकों के मनःपटल पर अपने तमाम संदर्भों के साथ जीवित हो उठते हैं। वैचारिक-भावात्मक बेचैनी, उथल-पुथल के ऐसे मोड़ों पर से हमें ले गुजरते हैं जहाँ सब कुछ बिल्कुल साफ़ दिखाई देने लगता है। अपने मन की अतल गहराइयाँ, दूसरों की चालों के पार्श्व में छिपी मानसिक विकृतियाँ या मजबूरियाँ भी, एक मस्तमौलाना, पागल-से दिखनेवाले अति आम आदमी का सूखी लौकी की बाँसुरी - सा बजाकर इन तमाम गुंडा चूहों को समंदर में ले जाकर डूबोना और सारे मान-सम्मान, नगरपाल पद भी ठुकराकर और अंत में झूठे आरोपों के तहत जेल में बंदी बनकर रहते हुए लौकी की नई-नई प्रजातियाँ विकसित करते रहना-भविष्य में उत्क्रांत हुए चूहे के मनुष्य रूप का या मनुष्य चूहा रूप का सामना करने हेतु - उपन्यास को एक अलग ही बिंदु पर ला खड़ा करता है जहाँ अतीत के सारे अहिंसा संदर्भ उपन्यास को एक अलग ही ऊँचाई दे जाते हैं साथ ही पाठकों को कई आयामों में, परिप्रेक्ष्यों में सोचने को बाध्य कर देते हैं ।यह उपन्यास आम आदमी के जीवन का केन्द्र बनी, जीवन पर हावी हुई षड़यंत्रों भरी राजनीति के इन तमाम अंधकारों को दर्शाते हुए कोई जादुई परिवर्तन या सुखांत हल या आशाप्रद भविष्य के सपने नहीं दिखाता। हाँ, इन दलदलों में जीते हुए, अंधःकारों को सहते हुए भी न थकते हुए साँस लेने की जीजीविषा वृत्ति के प्राणवायु को हमारी धड़कनों में, फेफड़ों में भर जरूर देता है।- पद्मजा घोरपड़े

विजय तेंडुलकर -वर्तमान भारतीय रंग-परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण नाटककार के रूप में समादृत श्री तेंडुलकर मूलतः मराठी के साहित्यकार हैं जिनका जन्म 7 जनवरी, 1928 को हुआ। उन्होंने लगभग तीस नाटकों तथा दो दर्जन एकांकियों की रचना की है, जिनमें से अनेक आधुनिक भारतीय रंगमच की क्लासिक कृतियों के रूप में शुमार होते हैं। उनके नाटकों में प्रमुख हैं- शांतता! कोर्ट चालू आहे (1967), सखाराम बाइन्डर (1972), कमला (1981), कन्यादान (1983)। श्री तेंडुलकर के नाटक घासीराम कोतवाल (1972) की मूल मराठी में और अनुदित रूप में देश और विदेश में छह हजार से ज्यादा प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं। मराठी लोकशैली, संगीत तथा आधुनिक रंगमंचीय तकनीक से सम्पन्न यह नाटक दुनिया के सर्वाधिक मंचित होने वाले नाटकों में से एक का दर्जा पा चुका है। महान नाटककार होने के साथ साथ श्री तेंडुलकर ने ‘कादम्बरी-एक’ व ‘कादम्बरी-दा' उपन्यास भी लिखे हैं ।श्री तेंडुलकर ने बच्चों के लिए भी ग्यारह नाटकों की रचना की है। उनकी कहानियों के चार संग्रह और सामाजिक आलोचना व साहित्यिक लेखों के पाँच संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इन्होंने दूसरी भाषाओं से मराठी में अनुवाद किये है, जिसके तहत नौ उपन्यास, दो जीवनियाँ और पाँच नाटक भी उनके कृतित्व में शामिल है। इसके अलावा बीस के करीब फिल्मों का लेखन । हिन्दी की 'निशांत', ‘मंथन’, ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य' आदि के लिए संवाद लेखन । दूरदर्शन धारावाहिक- ‘स्वयंसिद्धा’, ‘प्रिया तेंदुलकर टॉक शो' के लिए लेखन, संयोजन ।सम्मान/पुरस्कारः नेहरू फेलोशिप (1973-74), टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में अभ्यागत प्राध्यापक के रूप में (1979-1981), पदम् भूषण (1984), फिल्मफेयर से पुरस्कृत । 19 मई, 2008 को पुणे (महाराष्ट्र) में महाप्रस्थान ।★★★पद्मजा घोरपड़े -अनुवादिका का परिचयशिक्षा : एम.ए., पी-एच.डी. (हिन्दी), पुणे विश्वविद्यालय ।'कादंबदी- एक' विजय तेंडुलकर के मराठी उपन्यास का हिंदी अनुवाद 2000 | ‘गंगाधर गाडगील : प्रतिनिधि समीक्षा' (सह-अनुवाद) डॉ. सुधीर रसाल की मराठी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद 2002 ।पुणे आकाशवाणी तथा दूरदर्शन, बालचित्रवाणी से समय-समय पर भाषा-पाठ, कविताएँ, रूपक, वार्ता, साक्षात्कार प्रस्तुत ।सम्प्रति : हिन्दी विभागाध्यक्ष, स. प. महाविद्यालय, पुणे, (महाराष्ट्र)

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