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Kahani Ka Stri-Samay

by Rohini Agarwal
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788119014606
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 264
  • Original Price: INR 600.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 215 grams
  • BISAC Subject(s): General

हाशिये की कुहरीली छाया से निकलकर स्त्री इधर समय की प्रवक्ता और केन्द्र बिन्दु बन चुकी है। इतिहास में यह स्त्री की एक बड़ी छलाँग' है। बड़ी उपलब्धियाँ हमेशा अपने पीछे संघर्ष की लम्बी लीक लिए आती हैं, जहाँ कुछ दरकनें दिखती हैं तो हौसलों की ऊँची परवाज़ भी है; अपनी ही राख से ही चिनगारियाँ बीन कर नयी पहचान पाती जिजीविषा है तो पूरी ईमानदारी के साथ अपने अन्तर्विरोधों के आत्म-पड़ताल की निर्भीकता भी। हिन्दी कहानी क़दम-दर-क़दम इस चिन्तनशील स्वावलम्बी स्त्री- निर्मिति की प्रक्रिया की साक्षी रही है; हर्फ़-दर-हर्फ़ उसके सपनों और धड़कनों को; विचलनों, द्वन्द्वों और संशयों को उकेरती रही है। लेकिन पितृसत्तात्मक संरचना के दबाव क्या सिर्फ़ सामाजिक आचार-व्यवहार तक ही सीमित हैं? न्ना! वे दबे पाँव आलोचना के ज़रिये साहित्य में भी चले आते हैं जहाँ स्त्री-लेखन को मुख्यधारा के साहित्य के हाशिए पर रखने के आग्रह हैं तो स्त्री-कथाकारों के संघर्षमूलक अवदान को अलक्षित कर देने का दम्भ भी। ज़ाहिर है, यह पुस्तक इसलिए कि स्त्री-कथा-लेखन के नैरन्तर्य को; उसकी विकास-यात्रा की उपलब्धियों को; उसकी विशिष्ट कहन-भंगिमा, शैल्पिक विलक्षणता और सोद्देश्यता को अलग से रेखांकित किया जा सके। हिन्दी के सौ साल पुराने स्त्री-कथा-लेखन पर लब्धप्रतिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल का विश्लेषण पाठक को एक नयी विचार - यात्रा पर ले जायेगा, ऐसा हमारा विश्वास है । निस्संग विश्लेषण और सघन आत्मपरकता की अन्तर्लीन लहरों की सवारी गाँठते हुए रोहिणी अग्रवाल जिस प्रकार कृति को उसकी संकुचित परिधि से मुक्त कर हमारे अपने काल-खण्ड तक ले आती हैं; और फिर पात्रों के मनोविज्ञान पर गहरी पकड़ बनाते हुए कहानी के पारम्परिक अर्थ में नया अर्थ भरती हैं, वह सचमुच विस्मित कर देने वाला सर्जनात्मक अनुभव है। यह पुस्तक स्त्री-कथा-लेखन और स्त्री-आलोचना दोनों के निरन्तर विकास की साक्षी है।

हिन्दी की चर्चित लेखिका हैं रोहिणी अग्रवाल और गज़ब की पढ़ाकू भी। हिन्दी साहित्य की ही नहीं, भारतीय और विदेशी साहित्य की भी। कहानियाँ लिखते-लिखते अचानक आलोचना लिखने लगीं तो वहीं खूँटा गाड़ कर बैठ गयीं। बरसों पुराना पढ़ा-लिखा स्मृतियों के कंगूरे से उतर कर आलोचकीय विवेक का हमक़दम क्या हुआ कि आलोचना के विशुद्ध बौद्धिक तेवरों में सृजनात्मकता की लय और जीवन्तता घुलने लगी। लेकिन वह रचनात्मकता ही क्या जो एक जगह एक ही रूप में रुक-टिक कर बैठ जाये। आलोचक के तौर पर रिड्यूस की जाने लगीं तो संस्मरण और कविता की दुनिया में आवाजाही करने लगीं। स्त्री विमर्शकार तो खैर हैं ही, सैलानी भी कम नहीं। तिस पर वक्तृता कला में माहिर । 9 दिसम्बर 1959 को पंजाब में जन्मी रोहिणी अग्रवाल की कर्मस्थली है रोहतक, हरियाणा। हिन्दी-अंग्रेज़ी- पत्रकारिता में मास्टर्स डिग्री भी यहीं से ली, हिन्दी में पीएच.डी. भी यहीं से की, और यहीं महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय में सैंतीस वर्ष तक अध्यापन करने के दौरान अपने को री-इन्वेंट करते हुए कविता-कहानी-आलोचना में रचा भी अपने कृतित्व के लिए पुरस्कृत- सम्मानित भी हुई। 1987 से 2019 तक चार बार हरियाणा साहित्य अकादमी से सम्मानित होने के अलावा स्पन्दन आलोचना सम्मान (2010), रेवान्त मुक्तिबोध सम्मान (2016), वनमाली कथा-आलोचना सम्मान (2017), चड़म्पुषा सांस्कृतिक सम्मान (2017), डॉ. शिव कुमार मिश्र स्मृति सम्मान (2017), डॉ. रामविलास शर्मा स्मृति सम्मान (2018) और नारी शक्ति सम्मान (2019) से विभूषित भी हो चुकी हैं। प्रकाशित कृतियाँ : आलोचना : हिन्दी उपन्यास में कामकाजी महिला (1992), एक नज़र कृष्णा सोबती पर (2000). इतिवृत्त की संरचना और संरूप (2005), समकालीन कथा साहित्य : सरहदें और सरोकार (2007), स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प (2011), साहित्य की ज़मीन और स्त्री मन के उच्छ्वास (2014), हिन्दी कहानी: वक़्त की शिनाख्त और सृजन का राग (2015), हिन्दी उपन्यास का स्त्री पाठ (2015), साहित्य का स्त्री स्वर (2016), हिन्दी उपन्यास: समय से संवाद (2016), कथालोचना के प्रतिमान (2020), कहानी का स्त्री-समय (2023), उपन्यास में सदी का अक्स (2023), कहानी : घने बरगद तले (1987), आओ माँ, हम परी हो जायें (2012), कविता लिखती हूँ मन (2023)। सम्पादित पुस्तकें : मुक्तिबोध की प्रतिनिधि कहानियाँ (2013), उपा प्रियंवदा की प्रतिनिधि कहानियाँ (2018)। सम्पर्क : +91-9416053847 ई-मेल: rohini1959@gmail.com

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