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Kambakhat Is Mode Par

by Ramesh Chandra Shah
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788181436689
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 94
  • Original Price: INR 65.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 100 grams
  • BISAC Subject(s): General

क़म्बख्त इस मोड़ पर - मेले में खो गया था मैं एक बार... ऐसे ही। उँगली जिसकी थामे था, वही मुझे भूल गया था। ... भीड़ का रेला आया तो पता नहीं कैसे उस उँगली की पकड़ छूट गयी।... इधर बच्चा बिलख रहा है - भीड़ को उसका बिलखना नहीं सुनाई देता - भीड़ को वह दीखता तक नहीं; और उधर उसका पिता है, जो भूल ही गया है कि उसका बच्चा जो उसके साथ था, उसके साथ नहीं है। जाने कब कैसे कहाँ उससे अलग हो गया है।इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि मेरे साथ कुछ वैसा घटित हुआ था कि नहीं... वह बच्चा मेरे भीतर अब भी उसी तरह बिलख रहा है...हर सान्त्वना से परे।... यह दुनिया उसके लिए उन रौंदते-कुचलते पाँवों- असंख्य पाँवों -का ही रेला है, जिससे बाल-बाल बच जाना एक अनर्गल संयोग भर है। सचाई जो है, वह यही है कि वह अपने पिता को पुकार रहा है बिलखता हुआ... और पिता उसकी पुकार की पहुँच से बाहर है।पिता! तुम मिल गये-मैंने पहचान भी लिया तुमको। काफ़ी दूर तक यह भ्रम बना रहा और एक दिन फिर अचानक वह भ्रम भी टूट गया। दिनदहाड़े, उसी तरह। बिना किसी मेले की रेलमपेल के, तुम्हारी पहचान फिर से ग़ुम हो गयी-कभी वापस न लौटने के लिए।तो क्या अब जाकर वह मुझे वापस मिलने जा रही है? इतने बरसों... युगों के बाद?सच में, तुमसे बात करते-करते कई बातें मेरी समझ में आ रही है जो पहले कभी नहीं आयी थीं। आमने-सामने बात नहीं हो सकती। आमने-सामने सिर्फ़ बहस हो सकती है, चोट पर चोट हो सकती या लम्बी-लम्बी चुप्पियाँ, अबोला तक हो है... सकता है।... पहले की बात और थी, कहके हम आज की समस्या को नहीं निपटा सकते। ज़माना बदल गया है। आज हम खेल तक खेल की तरह नहीं खेलते। बग़ैर 'किलर इंस्टिंक्ट' के आज खेल की बात भी नहीं होती। कैसे भयानक समय में जी रहे हैं हम!...हम, यानी हमारे बच्चे। हमारी किशोर और नौजवान पीढ़ी। भुगतना तो उन्हें है: हम तो अपना जीवन जी चुके। क्या ज़रूरी है कि हमारा जिया और भुगता हमारे बच्चों के भी काम का हो! वह निरर्थक हो सकता है, यह हम क्यों नहीं क़बूल करना चाहते?

रमेशचंद्र शाह - जन्म 1937, अल्मोड़ा (उत्तरांचल) में। शिक्षा अल्मोड़ा तथा प्रयाग विश्वविद्यालय में। भोपाल के हमीदिया महाविद्यालय से सन् 1997 में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष पद से निवृत्त होने के बाद भोपाल स्थित निराला सृजनपीठ के निदेशक रहे- सन् 2007 तक। उपन्यास 'गोबरगणेश' मध्य प्रदेश साहित्य परिषद तथा हिन्दी संस्थान, उत्तर प्रदेश से तथा 'पूर्वापर' भारतीय भाषा परिषद कोलकाता द्वारा पुरस्कृत। उपन्यास 'क़िस्सा गुलाम' नेशनल बुक ट्रस्ट की 'आदान-प्रदान' योजना के अन्तर्गत आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। श्री शाह को मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा सन 1987-88 में सृजनात्मक योगदान के लिए 'शिखर सम्मान' से तथा 'के. के. बिड़ला फाउंडेशन' द्वारा सन् 2002 में व्यास-सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही उन्हें 2004 में अपने साहित्यिक योगदान के लिए 'पद्मश्री' अलंकरण से भी विभूषित किया जा चुका है।'बहुचर्चित 'गोबरगणेश', 'क़िस्सा गुलाम', 'पूर्वापर', पुनर्वास 'आख़िरी दिन' के बाद श्री शाह के दो और उपन्यास 'आप कहीं नहीं रहते विभूतिबाबू' (2001) और 'सफेद परदे पर' भी (2006) अपनी प्रयोगशील गुणवत्ता के लिए सराहे गए हैं। यह आठवाँ उपन्यास भी उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाता है।उपन्यासों के अतिरिक्त शाह के पाँच कहानी-संग्रह तथा प्रतिनिधि कहानियाँ' शीर्षक संकलन (राजकमल पेपरबैक) भी प्रकाशित है। छह कविता-संग्रहों, छह निबन्ध संग्रहों और अनेक आलोचना- पुस्तकों के प्रणेता शाह की अनेक विधाओं में सफल और सार्थक रचनाशीलता का पर्याप्त परिचय उनके 'बहुवचन' नामक ऑम्लीबस संकलन (किताबघर) तथा यात्रा वृत्तान्त 'एक लम्बी छाँह' को पढ़ने से मिल सकता है।शाह कई बरसों से भोपाल में ही रह रहे हैं। पत्नी ज्योत्स्ना मिलन (कवि-कथाकार); और दो बेटियाँ: शम्पा शाह (सिरेमिक आर्टिस्ट) तथा राजुला शाह (कवि कहानीकार फ़िल्मकार)।

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